Sunday, 10 June 2012


किसकी परछाइयाँ

उस लकीर पर जहाँ, मिलते हैं ज़मीं आसमां
गुज़रते हैं अक्सर देर रात सितारों के कारवां,

उसी मंज़िल पर हैं कहीं, रौशनी के चिलमन -
वहीँ पर कहीं है,शायद मेरा पोशीदा मेहरबां,

किस के दम पर हैं रौशन,आँधियों में ये दीये
जिन्हें बुझा न पाए, उभरती रेतीली आंधियां,

वक़्त ने चाह बारहा,यूँ तो मिटाना मेरा वजूद 
खुले सहरा में हैं तैरती,ये किसकी परछाइयाँ !

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/



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