Thursday, 22 September 2011


ग़ज़ल 

ये गुमां था  वो चाहते हैं, हमें ज़िन्दगी से कहीं ज़्यादा
साँस रुकते ही सभी,वो ख़ुशी केअबहाम दूर होने लगे,

बामे हसरत पे शाम ढलते वो चिराग़ जलाना न भूले 
ताबिशे रूह लरजती है,राहत ओ आराम दूर होने लगे, 

मैंने ख़ुद ब ख़ुद ओढ़ ली है, तीरगी ए फ़रामोश शायद 
लज्ज़ते मुहोब्बत, मरहले शाद, तमाम दूर होने लगे,

इक पल नज़र से दूर न होने की, ज़मानत थी बेमानी 
रफ़्ता रफ़्ता यूँ, ज़िन्दगी से सुबहो शाम दूर होने लगे, 

-- शांतनु सान्याल 

अबहाम - कोहरा 
बाम - पठार
 ताबिश - चमक 
मरहला - वक़्त 
रफ़्ता - धीरे
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