Thursday, 4 August 2011

नज़्म

भीगते काग़ज़ के नाव रुक चले हों
शायद दिल के आँगन में कहीं -
तुमने छुआ है,अभी अभी जज़बात
इक सिहरन सी जगी लहरों में -
कहीं, बह चले  फिर भीगे अल्फाज़,
नन्हें हाथों के वो मिट्टी के बाँध
फिर दे चलें, मासूमियत से आवाज़,
न करो बंद हथेली, बेक़रार बूंदें -
हैं मुद्दत से बिखरने को यूँ भी बेताब,
कहाँ रख आये हँसी के मर्तबान 
खोल भी दो तमाम बंद रोशनदान,
किश्तों में मुस्कराने की अदा न
कर जाये कहीं ये ज़िन्दगी ही बर्बाद,
 
-- शांतनु सान्याल