Wednesday, 3 August 2011

ज़िन्दगी
बरसी हैं बूंदे रात ढलते, जलता रहा अंजुमन
यूँ तो कई बार छू कर गए वो अब्र, मेरा बदन, 
वो प्यास जो आग को दे गए झुलस नए नए
सदियों की भटकती रूह, है ये अनबुझ अगन,
पंखुड़ियों में  मैंने  लिखी थी शबनमी  ग़ज़ल !
पढ़ तो लिया उसने, न समझ पाया मेरा मन,
सिसकती वादियों में हैं कुछ मुरझाये नर्गिस
पाता हूँ आइने में अक्सर,ये वक़्त तेरी  थकन,
मुस्कराए तो सही, कि मज़ाक है ये चेहरा मेरा -
झूठ ही सही निभाए तो ज़रा,ज़िन्दगी का चलन.
-- शांतनु सान्याल