Monday, 1 August 2011

ग़ज़ल
कोई आहट,जो नींद से कर जाए अनबन -
ख़ामोश दस्तक ने मुझे रात भर सोने न दिया,
वो शख्स जो निगाहों में रखता है ज़िन्दगी
पलकों के उस ख़्वाब ने उम्र भर रोने न दिया,
गहरी साँसों में लिए जीने की वो अदायगी
दिल की क़श्ती को मगर उसने डुबोने न दिया,
दामन में मेरे शिफ़र के सिवा कुछ भी न था
न जाने क्यूँ उसने किसी और का होने न दिया,
दुनिया की सौगातें बाँट न सका किसी को
भरी बरसात में उसने दिल को भिगोने न दिया,
वक़्त के झूले, रिश्तों के मेले, भटकता रहा !
हाथों को थाम मेरे हर लम्हा उसने खोने न दिया,
ख़ामोश दस्तक ने मुझे रात भर सोने न दिया !
-- शांतनु सान्याल