असंख्य बसंत गुज़रे छू कर इस झूलते दालान को,
अनगिनत बार
देखा है
लड़खड़ाते सूरज के अवसान
को, उड़ान पुलों की रफ़्तार
रुक जाती है आधी रात,
कोई याद नहीं
करता
शलभ के मूक बलिदान को,
सुबह से पहले झर
जाते हैं गंधहीन
रजनीगंधा,
छोड़
जाती है चाँदनी ज़मीन पर
निढाल देह प्राण को,
रात लौट जाती
है किसी
दूरगामी रेल की तरह अज्ञात
गंतव्य की ओर, दूर तक
निविड़ कोहरा निगल
जाता है ख़्वाबों
के मरुद्यान
को,असंख्य बसंत गुज़रे छू
कर इस झूलते
दालान को ।
- - शांतनु सान्याल

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