15 फ़रवरी, 2026

सतह के ऊपर - -

डूबने से पहले मुस्कुराया था

सजल शामियाना, गहन
स्रोंतों के मध्य भी
ज़िन्दगी ने न
हार माना,
लहूलुहान पाँव चल कर भी
उभरता है अस्तित्व,
क्षत विक्षत देह
के अंदर
छुपा
था दिव्य ख़ज़ाना, उस अदृश्य
देवालय के द्वार कभी बंद
नहीं होते, ज़रूरी है
सही समय उस
गंतव्य पर
पहुंच
पाना,
अंतरतम के अतल तक पहुंच
पाना आसान नहीं, बहुत
सहज है किसी के
माथे को यूँ ही
सहलाना ।
- - शांतनु सान्याल

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