31 मार्च, 2025

अशेष तृष्णा - -

असमाप्त ही रहे अथाह गहराई में उतरने की
अभिलाषा, अदृश्य भोर की तरह तुम 
रहो मेरे बहुत नज़दीक, अंतहीन
संभावनाओं में कहीं पुनर्जन्म
की है आशा, अभी से न 
कहो अलविदा अभी
तो है शैशव -
कालीन
अंधकार, रात्रि को ज़रा पहुंचने दो वयःसंधि
पड़ाव के उस पार, संकुचित निशि पुष्प
के गंध कोषों में अभी तक है एक
अजीब सी   द्विधा, बिखरने
से पहले मधु संचय भी
ज़रूरी है, साँसों
में घुलने दो
सुरभित
स्पृहा,
सब कुछ आसानी से ग़र हो हासिल, तब -
समय से पहले मर जाती है जिज्ञासा,
असमाप्त ही रहे अथाह गहराई 
में उतरने की अभिलाषा ।
शब्दहीनता को बढ़ने
दो बंजर भूमि की
तरह दूर दूर
तक, मरु
उद्यान
की तलाश रहे अधूरा, जीवन न बने नीरस कुछ
और बढ़े जीने की अदम्य पिपासा, असमाप्त 
ही रहे अथाह गहराई में उतरने की
अभिलाषा ।।
- - शांतनु सान्याल

27 मार्च, 2025

पुनर्प्राप्ति - -

अस्तगामी सूर्य के साथ डूब जाता है विगत काल,

धीरे धीरे सभी स्मृतियां, अंध घाटियों में हो
जाती हैं विलीन, क्रमशः जीवन बढ़
चला है धूसर पथ से हो कर
अंधकारमय गुफाओं
में, यहीं से आत्म
खोज का
होता है
आरंभ,
बिखरे पड़े हैं चारों तरफ देह के बाह्य - अंतर्वस्त्र,
निःशब्द कर जाता है फिर से दर्पण का
सवाल, अस्तगामी सूर्य के साथ
डूब जाता है विगत काल ।
आदिम युग से बहुत
जल्दी लौट आता
है अस्तित्व
मेरा
पुनः समेटता है बिखरे हुए अंग प्रत्यंग के खोलों को, रखता है सहेज कर एक एक संवेदनाओं
को उनके अंदर किसी सीप की तरह,
रात्रि सहसा बढ़ चली है गहन
सागरीय मायांचल की
तरफ, एक अदृश्य
स्पर्श मुझे कर
जाती है
शापमुक्त, देह के क्षत विक्षत अंग फिर भर चले हैं
आहिस्ता आहिस्ता, पुनः जी उठा हूँ मैं इस
पल सब कुछ खूबसूरत है बहरहाल,
अस्तगामी सूर्य के साथ डूब
जाता है विगत
काल ।
- - शांतनु सान्याल



19 मार्च, 2025

आहत प्रहरी - -

गली के उस पार से उठा बवंडर दूर तक

धुआं फैला गया, बिखरे पड़े हैं हर
तरफ पत्थरों के टुकड़े, और
आदिमयुगीन बर्बरता के
निशान, चेहरे में भय,
आतंक के साए,
टूटे हुए मंदिर
के कपाट,
शहर
की हवाओं में जाने कौन ज़हर बिखरा
गया, गली के उस पार से उठा
बवंडर दूर तक धुआं फैला
गया । कल शाम शहर
में था भेड़ियों का
अप्रत्याशित
आक्रमण,
सांध्य
पूजा
के पहले मृत्यु का आमंत्रण, प्रहरी भी
थे बेपरवाह अपने आप में निमग्न,
हिंस्र पशु नोचते रहे निरीह
मानव अंग, कुछ देर यूँ
लगा हम आज भी
जी रहे हैं मध्य
प्रस्तर युग
में कहीं,
मुद्दतों से शांत धरातल को सहसा कोई
दहला गया, गली के उस पार से
उठा बवंडर दूर तक धुआं
फैला गया । हर कोई
सोचने को है
मजबूर
कि
वन्य पशुओं से ख़ुद को कैसे बचाया
जाए, बस इसी एक बिंदु पर
गुज़रा हुआ कल अंदर
तक अदृश्य अनल
सुलगा गया,
गली के
उस पार से उठा बवंडर दूर तक धुआं
फैला गया - -
- - शांतनु सान्याल

17 मार्च, 2025

मन दर्पण - -

उम्र की ढलान पर है शून्यता की छाया,

पिंजर द्वार हैं उन्मुक्त, विहंगम नभ
फेंक रहा उड़ान पाश, फिर भी
मन पाखी नही चाहता
छोड़ना बंदीगृह,
बहुत कठिन
है छोड़ना
सभी मोह माया, उम्र की ढलान पर
है शून्यता की छाया । मंदिर घाट
की सीढ़ियों से उतर कर जल
स्पर्श द्वारा सिंधु पार की है
कल्पना, काश सहज
होता फल्गु नदी
के पार देह
का नव
रूप
में ढलना, हज़ार बार देखा मन दर्पण
वही बिम्ब धूसर, वही माटी की
काया, उम्र की ढलान पर
है शून्यता की छाया ।
- - शांतनु सान्याल

16 मार्च, 2025

अन्तःप्रवाह - -

जन अरण्य में खोजता हूँ एक अदद

परछाइयों का चेहरा, न जाने
कहाँ खो गए चाहने वालों
की जमात, एक मृग -
तृष्णा से कुछ
कम नहीं
ताउम्र
साथ रहने की बात, किताबों में यूँ
तो बहुत कुछ लिखा था, मरु
उद्यान से ले कर स्वर्ग की
अप्सराओं के असंख्य
किस्से, यहाँ भी हैं
एकाकी वहाँ
भी पसरा
हुआ
है सघन कोहरा,जन अरण्य में
खोजता हूँ एक अदद
परछाइयों का
चेहरा ।
इस
राह के मुसाफ़िर का सफ़र कभी
नहीं होता पूरा, गन्तव्य से भी
कहीं आगे है यायावर
यात्रियों का डेरा,
फिर भी जी
चाहता है
कि
तुम चलो मेरे संग दूर तक, अंतिम
प्रहर तक थामे रखो निःश्वास
बंधन, अभी तक क्षितिज
पर है अंधेरे का शख़्त
पहरा, जन अरण्य
में खोजता हूँ
एक अदद
परछाइयों
का
चेहरा । सहस्त्र अभिलाष अंतहीन
स्वप्न के रेगिस्तान, बहोत कुछ
पाने की चाहत का होता
नहीं कोई अवसान,
कभी ज़रा सी
चीज़ पर
मिल
जाए खोया हुआ ख़ज़ाना, और
कभी बहुत कुछ मिलने के
बाद भी जीवन लगे
अनंत वीराना,
शून्य के
अंदर
ही
रहता है गुमशुदा कोलाहल, ख़ुद
के भीतर ही रहता है मौजूद
एक झील अथाह गहरा,
जन अरण्य में
खोजता हूँ
एक
अदद परछाइयों का चेहरा ।
- - शांतनु सान्याल

11 मार्च, 2025

शाश्वत सत्य - -

मध्य रात्रि, निस्तब्ध सारा शहर,

बिखरे पड़े हैं प्राचीर के
पुरातन पत्थर,
बाह्य परत
पर बूंद
बूंद
ओस कण, गहन अंतरतम में तुम
बांध चुके हो स्थायी घर, मध्य
रात्रि, निस्तब्ध सारा
शहर । चिर बंदी
होना चाहे
सदियों
का
बंजारापन तुम्हारे वक्षःस्थल के
अंदर, शिराओं से हो कर
बहता जाए प्रणय
रस, अनंत
पथ की
ओर
अग्रसर, देह प्राण डूब चले हैं
क्रमशः, सुदूर खींचे लिए
जाए निःसीम तुम्हारे
नयन गह्वर, मध्य
रात्रि, निस्तब्ध
सारा
शहर । न तुम अब तुम हो न मेरा
कोई पृथक अस्तित्व, एक
दूजे से मिल कर अब
हैं एकाकार, अपने
लिए इस पल
में नारी
पुरुष
सब
एक बराबर, अधरों के मिलन बिंदु
पर जीवन रहता है अजर
अमर, कोई भेद नहीं
इस क्षण क्या
सुधा और
क्या
प्राणघातक ज़हर, मध्य रात्रि,
निस्तब्ध सारा
शहर ।।
- - शांतनु सान्याल

02 मार्च, 2025

सुदूर कहीं - -

 

उनिंद से हैं बोझिल सितारों की सुदूर अंजुमन,

रात ढले महकना चाहे बेक़रार दिल का चमन,

प्रसुप्त कोशिकाओं में सजलता भर गया कोई,
न जाने कौन मधुऋतु की तरह छू गया अंतर्मन,

हवाओं में है अद्भुत सी मंत्रमुग्धता का एहसास,
वन्य नदी के किनार फिर खिल उठे हैं महुलवन,

एक मायावी तरंग जो शरीर से रूह तक है उतरे,
इक संदली स्पर्श जो कर जाए नम जीवन दहन,

हर तरफ हैं अनगिनत बंदिशों के पाषाणी दीवार,
जाने कौन खिंचे लिए जाए अपने साथ ज़बरन ।
- - शांतनु सान्याल

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