Wednesday, 30 October 2013

हो सके तो करना इंतज़ार - -

उभरने दे मुझे बेक़रार लहरों से ज़रा,
ग़र हो सके तो करना इंतज़ार
साहिल ए शिकस्ता पे
मेरा, है मुझे
ऐतबार
तेरे इश्क़ हक़ीक़ी पे इस क़दर, तुझे
पाने की हसरत में मौज ए
दरिया तो क्या, हर
क़यामत से
गुज़र
जाऊं मैं, रस्म ज़माना, ईमान ओ -
अक़ीदत रहे अपनी जगह,
इक तेरी नज़र की
बात है फिर
किसे
चाहिए पोशीदा आसमानी खुशियां !
* *
- शांतनु सान्याल

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Tuesday, 29 October 2013

बहोत मुश्किल है - -

तुम जाओ कहीं भी, आसां नहीं रिहाई ए -
वाबस्तगी, लौट आओगे दिल के 
क़रीब इक दिन, बहोत 
मुश्किल है दोबारा 
कहीं दिल 
लगाना, ये वो हक़ीक़त है जो जां से गुज़र 
जाए, अहसास नाज़ुक लेकिन, जो 
दिलकी परतों पे दे जाए 
अंतहीन निशां ! 
बहोत 
मुश्किल होगी ज़ख़्मी जिगर छुपाना, वो 
जो हमारे दरमियां थी मसावात ए 
ज़िन्दगी, सांस टूट जाए 
मगर उसका टूटना 
है नामुमकिन,
नहीं -
आसां ये हमनफ़स, नाबूद चमन को फिर 
बसाना, बहोत मुश्किल है दोबारा 
कहीं दिल लगाना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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Monday, 28 October 2013

स्व - प्रतिबिम्ब !

उभरते हैं ह्रदय कमल से कुछ मौन - -
पंखुड़ियां, लिए अंतर में नव 
मंजरियाँ, खिलते हैं 
बड़ी मुश्किल 
से अश्रु 
जल में डूबे सुरभित भावनाएं, जिनमें 
होती हैं अनंत गंध मिश्रित कुछ 
कोमल अभिलाषाएं, एक 
ऐसी अनुभूति जो 
जग में फैलाए 
मानवता 
की असीम शीतलता, जो कर जाए - -
भाव विभोर हर एक वक्षस्थल,
जागे आलिंगन की पावन 
भावना, मिट जाएँ 
जहाँ अपने 
पराए 
का चिरकालीन द्वंद्व, दिव्य सेतु जो 
बांधे नेह बंध, जागे हर मन में 
विनम्रता की सुरभि, हर 
चेहरा लगे स्व -
प्रतिबिम्ब !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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Wednesday, 23 October 2013

अहसास पहले - -

न दिखाओ मुझे गुल ए ख़्वाब कोई, 
जिसके मुरझाने का इमकां रहे 
तारी रात भर, इतना भी 
अपनापन ठीक 
नहीं कि 
आँख खुलते बिखर जाए आसमां -
की जामियत, क़तरा क़तरा 
नज़र आए मासूम 
वजूद मेरा,
और तुम मुस्कुराओ उफ़क़ पार यूँ 
गोया हो चला हो वक़्त से पहले
रंग तलुअ फ़ज़र कोई !
कुछ तो वक़्त 
दो मुझे,
कि तुम्हें अहसास करने से पहले - -
साँसों को संभलना आ जाए !
* * 
- शांतनु सान्याल  


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Monday, 21 October 2013

मुखालिफ़ ज़हर - -

वो तमाम शिकायतें जो कभी तुमको -
हमसे थीं, क्यूँ न फिर दोहरा 
जाओ, तुम्हें हमसे अब 
कोई दिलबस्तगी 
नहीं, इस 
बात का यक़ीन फ़िर इक बार तो दिला 
जाओ, तुम्हें फ़ुरसत मिले न मिले, 
हम तो हैं मुन्तज़िर उम्र 
भर के लिए, फिर 
भी रस्मियत 
ही सही,
किसी इक पल के लिए, राह निजात -
तो दिखा जाओ, हमें तलाश नहीं 
दरवाज़ा ए बहिश्त की,
ग़र हो सके तो 
अपने 
हाथों जो चाहे पिला जाओ, हम हो चुके 
है मुखालिफ़ ज़हर, इक ज़माने से !
* * 
- शांतनु सान्याल 

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Sunday, 20 October 2013

जिस्म ओ रूह चाहे राहत ज़रा - -

मालूम है मुझको शीशे की मजबूरी 
फिर भी दिल चाहे ख़्वाबों से 
खेलना, न छीनो मुझसे -
ये खिलौना, बहोत 
मुख़्तसर है - 
रात की ज़िन्दगानी, न दोहराओ -- -
वही रंज ओ ग़म की बातें, 
नई पुरानी दर्द भरी 
अलहदगी, 
जंग आलूद धुंधली मुलाक़ातें, अब -
इन बातों से ऊबती है ज़िंदगी,
कुछ नयापन चाहे दिल 
मेरा, जिसमें हो 
इक मुश्त 
ताज़गी, इक अहसास ए ख़ुशबू -- -
जो कर जाए तिलिस्म गहरा, 
कि जिस्म ओ रूह 
चाहे राहत 
ज़रा - -
* * 
- शांतनु सान्याल 
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Friday, 18 October 2013

शाश्वत प्रकाश - -

वो लुप्त है अंतर्मन में कहीं और नयन -
खोजें उसे धुंध भरी राहों में, एक 
मृगजल है; मेरी अंतहीन 
अभिलाषा, सब कुछ 
है आसपास 
लेकिन 
ह्रदय ढूंढ़े उसे धूमिल अरण्य के बीच, न 
अदृश्य, न ही उजागर वो है हर 
सांस के लेखाचित्र में 
निहित, केवल 
चाहिए 
स्व प्रतिबिम्ब का गहन अवलोकन, वो 
चेतना जो पढ़ पाए व्यथित मन 
की भाषा, जो हो घुलनशील 
हर चेहरे के ख़ुशी 
और दुःख
में डूब कर, जीवन चाहे वो शाश्वत - - 
सत्य का प्रकाश, जो दे जाए 
चिरस्थायी दीप्ति, 
अंतर तमस 
पाए - 
अनंतकालीन मुक्ति, जन्म जन्मान्तर 
से परिपूर्ण मोक्ष प्राप्ति - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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Sunday, 13 October 2013

चश्म अंदाज़ तुम्हारा - -

तुम्हारे दिल की गहराइयों का मुझे 
पता नहीं लेकिन ये सच कि 
तुम्हारी आँखों से 
छलकती 
है बाज़्ताबी अज़ ज़िन्दगी, और -
यही वो वजह है, जो मुझे 
उभारती है बहरान 
ए लहर से,
वक़्त मेहरबां रहे न रहे, चाहे रस्मे 
दुनिया भी जाए बदल, चश्म 
अंदाज़ तुम्हारा है इक 
संगे किनारा,
हर हाल में मेरा वजूद जी उठता है 
अनजाने क़हर से, 
* * 
- शांतनु सान्याल 

बाज़्ताबी अज़ ज़िन्दगी - जीवन का 
प्रतिबिम्ब 
बहरान ए लहर - तूफ़ानी लहर 
चश्म  अंदाज़- दृष्टिकोण 

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ख़ुश्बू की मानिंद - -

फिर तेरी निगाह ए गिरफ़्त है ज़िन्दगी,
फिर चाहता है दिल ख़ुश्बू की
मानिंद दूर तलक बिखर
जाना, थक से
चले हैं -
जिस्म ओ जां, इक बेइंतहा भटकाव - -
और लामहदूद ख़्वाहिशें, दिल
चाहता फिर तेरी, पलकों
के साए ठहर जाना,
न पूछ मुझ से
किस
तरह से गुज़री है शब तारीक का सफ़र !
हर सांस इक सदी, हर लम्हा
गोया उम्र क़ैद, तुझे खो
कर बहोत मुश्किल
था ज़िन्दगी
का फिर
उभर पाना, फिर चाहता है दिल ख़ुश्बू की
मानिंद दूर तलक बिखर जाना - -
* *
- शांतनु सान्याल
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Saturday, 12 October 2013

राहत ए गुलिस्तां - -

बज़्म में है तेरी क्यूँ ख़ामोशी दूर तलक,
हम तो आए थे बड़ी उम्मीद लिए,
कि ज़िन्दगी से हो जाए खुल 
के मुलाक़ात, ये क्या 
हर चेहरा लगे 
गुमसुम,
हर लब पे गोया पाबंदी आयद, ये कैसी 
है तेरी महफ़िल, उभरते तो हैं रह 
रह कर इन्क़लाब ए अरमां, 
लेकिन बदोन सदा,
ये कौन सी 
ज़मीं है, 
ये कैसा है आसमां, लौटती नहीं जहाँ से 
गूँज, तब्दील ए जहां बन कर !
बरसती नहीं क्यूँ तेरी 
निगाह करम,
हर रूह 
पे राहत ए गुलिस्तां बन कर - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  

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Friday, 11 October 2013

बहोत नज़दीकी ठीक नहीं - -

बहोत नज़दीकी ठीक नहीं, बेहतर हो, इक
पोशीदा दूरी हो दरमियां अपने,
बिखरना हो, जब कभी 
तो यूँ बिखरें कि 
किसी को 
भी 
दर्द महसूस न हो, न मांग मुझसे ख़्वाबों -
की ज़मीं, इक वही है मेरी अपनी 
मिल्कियत ए हयात, वर्ना 
शिफ़र हथेलियों में 
आड़ी तिरछी 
लकीरों 
के सिवा, कुछ भी नहीं, न देख मुझे बारहा 
यूँ उम्मीद भरी नज़र से, कि मैं हूँ 
इक बहता हुआ दरिया ए 
घुम्मकड़, न जाने 
किस ओर 
बह 
जाऊँगा, बेहतर है लौट जाओ किनारे से -
चुपचाप, ग़ैर मुन्तज़िर तूफ़ान 
घिरने से पहले - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

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Wednesday, 9 October 2013

मुकम्मल फ़िदाकारी !

न रख कोई उम्मीद मुझसे ये ज़माना 
कि इश्क़ में, मैंने पा लिया है 
चाहत से कहीं ज़्यादा,
अब दिल में 
कोई 
ख़्वाहिश बाक़ी नहीं, तखैल से परे है,
वो अहसास ए इत्मीनान, अब 
क्या ज़हर, या नोश अमृत,
हर चीज़ है बेअसर,
मैं तमाम उन 
ख़ुमारी 
से निकल बहोत दूर जा चुका हूँ, जहाँ 
रूहें मिलती हैं इक दूसरे से यूँ 
गोया कोई अज़ीम दरिया 
समा जाए ख़ामोश 
समंदर के 
सीने 
में, अंतहीन गहराइयों की जानिब - - 
न कोई पता, न ही कोई नाम 
ओ निशां, मुकम्मल
फ़िदाकारी !
* * 
- शांतनु सान्याल   

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Tuesday, 8 October 2013

न वो ज़ाहिर, न ही ग़ायब - -

न वो ज़ाहिर, न ही ग़ायब, वो शख्स - 
कोई नहीं मेरा हमसाया था,
जब तमाम दरवाज़े 
हो गए बंद, 
लोगों 
ने बना दिया जब, मुझे मुकम्मल - -
अजनबी अपने ही शहर में,
कहीं दूर नहीं उसका 
अस्क, मेरी 
भीगी 
पलकों से ज़रा ऊपर ही मैंने पाया था,
मुश्किल ज़रूर था, बिखर कर 
दोबारा संभलना, लेकिन 
नामुमकिन भी 
न था,
शीशे के हर टुकड़ों में तन्हा ख़ुद को -
महज पाया था, और यही 
तन्हाई ने मुझे दिलेर 
बनाया था,
वर्ना 
तूफ़ान ए ज़माने के ज़द से बचना न 
था इतना भी आसां !
* * 
- शांतनु सान्याल 

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रूह ख़ानाबदोश - -

न जाने कौन, जो देता है दस्तक अँधेरा -
घिरते, शाम ढलते इक चिराग़ 
जैसे जला जाता है, दिल 
की वीरान बस्ती 
में, बारहा 
लौट आती है मेरी रूह, तर्ज़ बाज़गश्त !
पुरअसरार वादियों का बदन 
छू कर, न जाने क्या 
है छुपा, उन 
आँखों 
की गहराइयों में, महकते हैं जज़्बात रात 
गहराते, उठते हैं दिल की धड़कनों में 
रह रह कर ख़ुशबुओं के, ठहरे 
हुए तूफ़ान अनगिनत !
फ़िर ख़्वाबों में 
भटकती 
है ज़िन्दगी हमराह कहकशाँ, बहोत दूर 
तलक, जहाँ मिलती है नदी की 
मानिंद, ये गरेज़ान शब !
सीने में दबाए राज़ 
गहरे, सुबह के 
समंदरी 
आग़ोश में, लबरेज़ कोई रूह ख़ानाबदोश
की मानिंद - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  

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Monday, 7 October 2013

सर्व व्याप्त सत्ता - -

न पृथ्वी, न अन्तरिक्ष, न महासागर,
उसका अस्तित्व है, अंतरतम 
की गहराइयों में कहीं, 
सभी तर्क जहाँ 
हो जाएँ 
मिथक, सभी दर्शन जहाँ हों निर्वाक,
उसी निःशब्द, अदृश्य सत्ता 
का प्रतिबिम्ब झलकता 
है, सजल नयन की 
गहराइयों में, 
कहीं, न
लिपि, न कोई वर्णमाला, न ही कोई -
भाषाई कलह, वो अनुभूति है 
दिव्य, जो समझ पाए 
दूसरों की व्यथा,
और वहीँ 
रहती है वो अगोचर शक्ति, रूप - रंग 
रहित लेकिन सर्व व्याप्त सत्ता,
हर सांस, हर एक स्पंदन 
में है वो सम्मिलित।
* * 
- शांतनु सान्याल 
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Friday, 4 October 2013

दोबारा मिलने का अरमान - -

न जाने फिर किस मक़ाम पे हो -
मुलाक़ात, कुछ मुस्कान
अपने साथ तो लेते
जाइए, मिलें
न मिलें
दोबारा, ये तो अख़तियार ए - - -
तक़दीर की है बात, फिर
भी, दोबारा मिलने
का अरमान,
अपने
दिल में लेते जाइए, कहने को ये -
दुनिया है बहोत ही उलझी हुई,
फिर भी इक मुश्त
आसमान,
मेरे हिस्से का अपने साथ तो लेते
जाइए - -
* *
- शांतनु सान्याल


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Wednesday, 2 October 2013

ज़िन्दगी का सफ़र - -

हर एक लम्हा अपनी जगह रखता है 
अहमियत, इक ख़्वाब ही तो 
है टूटा, निगाहों में 
उम्मीद तो 
बाक़ी 
है, बिखरे हैं जाम के टुकड़े फ़र्श पर -
बेतरतीब, तो क्या, मेरे पहलू 
में वजूद ए साक़ी है, न 
देख यूँ  मुड़ मुड़ 
के दर ए 
आसमां से, उजालों के लिए ज़मीर -
मेरा काफ़ी है, तेरा जाना 
बेशक है इक कमी, 
लेकिन, अभी 
तलक 
वादियों में बहार आना बाक़ी है, कैसे 
कहूँ ख़ुदा हाफ़िज़, ज़िन्दगी 
का सफ़र अभी तो 
बहोत बाक़ी 
है - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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