Tuesday, 8 October 2013

न वो ज़ाहिर, न ही ग़ायब - -

न वो ज़ाहिर, न ही ग़ायब, वो शख्स - 
कोई नहीं मेरा हमसाया था,
जब तमाम दरवाज़े 
हो गए बंद, 
लोगों 
ने बना दिया जब, मुझे मुकम्मल - -
अजनबी अपने ही शहर में,
कहीं दूर नहीं उसका 
अस्क, मेरी 
भीगी 
पलकों से ज़रा ऊपर ही मैंने पाया था,
मुश्किल ज़रूर था, बिखर कर 
दोबारा संभलना, लेकिन 
नामुमकिन भी 
न था,
शीशे के हर टुकड़ों में तन्हा ख़ुद को -
महज पाया था, और यही 
तन्हाई ने मुझे दिलेर 
बनाया था,
वर्ना 
तूफ़ान ए ज़माने के ज़द से बचना न 
था इतना भी आसां !
* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by cathy quiel 2