Monday, 21 October 2013

मुखालिफ़ ज़हर - -

वो तमाम शिकायतें जो कभी तुमको -
हमसे थीं, क्यूँ न फिर दोहरा 
जाओ, तुम्हें हमसे अब 
कोई दिलबस्तगी 
नहीं, इस 
बात का यक़ीन फ़िर इक बार तो दिला 
जाओ, तुम्हें फ़ुरसत मिले न मिले, 
हम तो हैं मुन्तज़िर उम्र 
भर के लिए, फिर 
भी रस्मियत 
ही सही,
किसी इक पल के लिए, राह निजात -
तो दिखा जाओ, हमें तलाश नहीं 
दरवाज़ा ए बहिश्त की,
ग़र हो सके तो 
अपने 
हाथों जो चाहे पिला जाओ, हम हो चुके 
है मुखालिफ़ ज़हर, इक ज़माने से !
* * 
- शांतनु सान्याल 

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