Monday, 6 August 2012


दो लफ़्ज़
ज़मीर से उठ कर जब अहसास बने मुक़द्दस, 
कोई ख़ूबसूरत पैकर, दिल में तब जागते 
हैं परस्तिश, तसव्वुर से कहीं आगे, 
हर इन्सान जहाँ लगे यकसां,
हर लब पे खिले मुस्कान 
दुआओं वाले, चेहरे 
पर उभरे वो 
पाकीज़गी मुस्तक़ल, झुक जाएँ ज़ालिमों के 
सर अपने आप, ये ख़ुदा दे मुझे वो 
रहमत कि हर सांस में हों 
इंसानियत रवां, 
कि हर 
चेहरे पे देखूं तेरा ही अक्श, नूर ए आबशार,

- शांतनु सान्याल 
Artist Peter Kelly 
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/