उल्लसित दर्शकों के मध्य है प्रसारित
मायावी अंधकार, हर एक हाथ
छूना चाहे देह का बालूमय
टापू, सिमटता जाए
उम्र का ढलता
किनार, इस
रात के
सीने पर है पुनः लज्जित अंतरतम का
सत्य, अलौकिक रंगमंच पर है
मंचित छायानृत्य । युगों
का थमा हुआ
अट्टहास,
पुनः
हो चला है जागृत, पुनर्जन्म के संधान में
चल पड़े हैं अभिशापित सभी जीवित
या मृत, अनंत पथ के वो यात्री
पाना चाहे इसी धरा पर
सूत्र अमर्त्य, अलौकिक
रंगमंच पर है मंचित
छायानृत्य ।
- - शांतनु सान्याल

बहुत अच्छा काव्य सृजन
जवाब देंहटाएंयार, यह कविता पढ़ते ही एक अलग ही दुनिया सामने आ जाती है। मुझे इसका “छायानृत्य” वाला इमेज बहुत मजबूत लगा, जैसे सब कुछ दिख भी रहा है और छिप भी रहा है। आपने जिंदगी, समय और भीतर के सच को बहुत अलग अंदाज में पकड़ा है।
जवाब देंहटाएंलौकिक और अलौकिक के मध्य बहुत बारीक रेखा है, दोनों को उजागर करती और छुपाती सुंदर पंक्तियाँ
जवाब देंहटाएं