हर एक वक्षःस्थल है एक गहन सरोवर लेकिन कमल नहीं खिलता हर किसी के सीने में,
कुछ कुहासों को छुपाए नयन कोरों
में हर चेहरा चाहता है सुबह का
मधुर आलिंगन, एक अद्भुत
सुख छुपा होता है जान
बूझ कर प्रणय गरल
पीने में, कमल
नहीं खिलता
हर किसी
के सीने में । वो एक अनाम नदी अपने आप में अंदर तक अनंत रहस्य छुपाए, उसमें जितना
डूबना चाहे ये जीवन, उतना ही सतह
पर उभरता जाए, जनम मरण के
इस शाश्वत अनुबंध में कहीं
रहता है एक अदृश्य
हस्ताक्षर, फिर
भी सब
कुछ भुला कर मज़ा आता है निरुद्देश्य जीने में,
कमल नहीं खिलता हर किसी के
सीने में ।
- - शांतनु सान्याल

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