06 मार्च, 2026

कुछ और पल - -

 
भोर के धुँधलके में बिखरे हुए हैं कपोत पंख,

एक गहन छटपटाहट के साथ रात बस
ढलने को है, सूखी नदी के दोनों
किनारे तकते रहे तृषित
नज़रों से आकाश
का सूनापन,
जीवन
की
सत्यता, अंध विड़ाल के संग बस छुपने को है,
एक गहन छटपटाहट के साथ रात बस
ढलने को है । जंग लगे देह में सुबह
की नरम धूप मधु मालती बेल
का एहसास दिलाए, जो
टूट कर बिखर गए
नयन कोर से
वही बून्द
पुनः
हृदय पुष्प खिलाए, जीने की उत्कंठा हर हाल
में गिर के संभलने को है, एक गहन
छटपटाहट के साथ रात बस
ढलने को है । लौट जाएंगे
सभी टिटहरी की तरह
सजल प्रांतर की
तलाश में,
छोड़
जाएंगे कुछ मद्धम प्रतिध्वनियां रक्तिम पलाश
में, कदाचित फिर कभी हम मिलें यूँ ही
किसी दिन अरण्य अज्ञातवास में,
कुछ देर और ज़रा जी लें बंद
पंखुड़ियों के मधुरिम
आवास में, कुछ
पल ग़र मिल
जाए, ये
ज़िन्दगी
फिर
बदलने को है एक गहन छटपटाहट के साथ
रात बस ढलने को है ।
- - शांतनु सान्याल

25 फ़रवरी, 2026

झूलता दालान - -

असंख्य बसंत गुज़रे छू कर

इस झूलते दालान को,
अनगिनत बार
देखा है
लड़खड़ाते सूरज के अवसान
को, उड़ान पुलों की रफ़्तार
रुक जाती है आधी रात,
कोई याद नहीं
करता
शलभ के मूक बलिदान को,
सुबह से पहले झर
जाते हैं गंधहीन
रजनीगंधा,
छोड़
जाती है चाँदनी ज़मीन पर
निढाल देह प्राण को,
रात लौट जाती
है किसी
दूरगामी रेल की तरह अज्ञात
गंतव्य की ओर, दूर तक
निविड़ कोहरा निगल
जाता है ख़्वाबों
के मरुद्यान
को,असंख्य बसंत गुज़रे छू
कर इस झूलते
दालान को ।
- - शांतनु सान्याल

20 फ़रवरी, 2026

बस यूँ ही - -

बस यूँ ही खड़े हैं हमें किसी

का इंतज़ार नहीं, वक़्त
दौड़ रहा है लेकिन
अब वो रफ़्तार
नहीं, उम्र
भर
बुनते रहे मुहोब्बतों के हसीन
पैरहन, उतरन हर सिम्त
जिनका कोई तलबगार
नहीं, कोहरे से
झाँकती हैं
गुमशुदा
फूलों
की वादियां, गुलदस्ते सजे हुए
दूर तक बस ख़रीददार नहीं,
हवाओं में आज भी है
इक अजीब सी
कशिश, इत्र,
शीशा है
सामने
फिर
भी दिल बेक़रार नहीं, कुछ लोगों
का ठिकाना मानचित्रों में नहीं
होता, दिलों में बसने वालों
को कैसे कहें असरदार
नहीं, एक अदद तन्हा
मुसाफिर मैं ही
नहीं ज़माने
में, जाना
तो है
एक दिन सभी को अभी मैं तैयार
नहीं, बस यूँ ही खड़े हैं हमें
किसी का इंतज़ार
नहीं ।
- - शांतनु सान्याल


 

16 फ़रवरी, 2026

टूटे पंख - -

क़दमों के निशान दूर जा कर

खो जाएंगे कहीं, किनारे
का बिखराव कोई
मुड़ कर देखता
नहीं, बारहा
एक ही
सवाल
और
लाजवाब ये ज़िंदगी, धुआँ
धुआँ सा हर तरफ फिर
भी रात अधजली,
चंद्र बिम्ब को
छूना चाहती
हैं रंगीन
मछलियां, अदृश्य जाल है
जानलेवा बुझती नहीं
दिल की लगी,
शून्य घरौंदें
तकते रहे
आसमां,
उड़
चुके प्रवासी पखेरु,धरातल
में बिखरे पड़े हैं कुछ
स्वप्न सप्तरंगी ।
- - शांतनु सान्याल

15 फ़रवरी, 2026

सतह के ऊपर - -

डूबने से पहले मुस्कुराया था

सजल शामियाना, गहन
स्रोंतों के मध्य भी
ज़िन्दगी ने न
हार माना,
लहूलुहान पाँव चल कर भी
उभरता है अस्तित्व,
क्षत विक्षत देह
के अंदर
छुपा
था दिव्य ख़ज़ाना, उस अदृश्य
देवालय के द्वार कभी बंद
नहीं होते, ज़रूरी है
सही समय उस
गंतव्य पर
पहुंच
पाना,
अंतरतम के अतल तक पहुंच
पाना आसान नहीं, बहुत
सहज है किसी के
माथे को यूँ ही
सहलाना ।
- - शांतनु सान्याल

10 फ़रवरी, 2026

एक ही जीवन - -

एक ही जीवन था किसी आदिम संदूक की

तरह, कभी सिर पर तो कभी कांधे
में थामे हम गुज़रते रहे, कहने
को यूं तो बहोत सारे थे
रुकने के ठिकाने,
उम्र भर का
संधिपत्र
रहा
निरर्थक, हमक़दम रह कर भी एक दूसरे से
हम रहे अनजाने, कुछ स्मृतियाँ ओझल
होती रहीं कुछ ख़्वाब टूट कर भी
महकते रहे, एक ही जीवन था
किसी आदिम संदूक की
तरह, कभी सिर पर
तो कभी कांधे में
थामे हम
गुज़रते
रहे ।
सफ़र में कोई किसी का बोझ नहीं ढोता,
बेहतर है ख़्वाहिशों की गठरी रहे
सीमित, बहुत कम फ़ासला
रहता है अक्सर दरमियान
धूसर और हरित, कभी
अतीत के अल्बम
निहारते और
कभी सब
कुछ
जानबूझ कर बिसरते रहे, एक ही जीवन
था किसी आदिम संदूक की तरह,
कभी सिर पर तो कभी कांधे
में थामे हम
गुज़रते
रहे ।
- - शांतनु सान्याल

18 जनवरी, 2026

शून्य का झूला - -

सुदूरवर्ती क्षितिज किनारे उठ चुका है

उत्तरायण का मेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला, कुछ ख़्वाब
रात ढले ढूंढते
हैं रेशमी
सुबह
का
ठिकाना, उन्हें मालूम है ज़िन्दगी की
मजबूरियां, रिश्तों का तक़ाज़ा
है लोग कहते हैं बनाएं
रख्खें आनाजाना,
दिल को यूँही
बहलाए
रखिए
कि
एक दिन पहुंच ही जाएंगे आकाशगंगा
के किनारे, यूँ तो आज नहीं ज़ेब
में एक भी ढेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला । छोटी छोटी
खुशियों में रहते हैं
शामिल लंबे
उम्र के
राज़,
अंधेरे रास्तों में भी अदृश्य उजाले कहीं न
कही से देते हैं आवाज़, उम्मीद का
ऐनक चाहे जितना लगे धुंधला
मन की आंखे कभी नहीं
होती अंध, जीने की
अदम्य ख़्वाहिश
में छुपी रहती
है एक
अनाम गंध, अनवरत चलता रहता है - -
जीत हार का रहस्यमय खेला, शून्य
में थमा हुआ सा लगे है सांसों
का हिंडोला ।
- - शांतनु सान्याल

09 जनवरी, 2026

रात्रि ढलान - -

ख़ामोश दुआओं की तरह पहाड़ तकता है

नीलाकाश, कुछ नीरव श्लोक
गुनगुनाते हैं विशाल वृक्ष,
अनंत निस्तब्धता है
अरण्य नदी के
आसपास,
सुदूर
पहाड़ों के उस पार निस्तेज सूर्य डूब चला
अंध घाटियों में जाग रहा है हिंस्र
संसार, ज़िन्दगी दौड़ रही है
बेतहाशा मृग - आर्तनाद
के समानांतर, सुबह
की तलाश में है
वक्षःस्थल
का
बहता हुआ निःशब्द निर्यास, ख़ामोश -
दुआओं की तरह पहाड़ तकता है
नीलाकाश । अभी तुम हो मेरे
सम्मुख,या छायापथ है
बिखरा हुआ असीम
आकाशगंगा की
तरह, नयन
बिंदु में
बह
रहे हैं अविरल आलोक स्रोत, कायाहीन
उड़ रहे हैं ख़्वाहिशों की तितलियाँ,
कदाचित हम लांघ आए बहुत
पहले ही अंध गलियां,
रात ढलते ढलते
महसूस हो
चला है
पुनर्जीवन का आभास, ख़ामोश दुआओं
की तरह पहाड़ तकता है
नीलाकाश ।
- - शांतनु सान्याल 

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past