18 जनवरी, 2026

शून्य का झूला - -

सुदूरवर्ती क्षितिज किनारे उठ चुका है

उत्तरायण का मेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला, कुछ ख़्वाब
रात ढले ढूंढते
हैं रेशमी
सुबह
का
ठिकाना, उन्हें मालूम है ज़िन्दगी की
मजबूरियां, रिश्तों का तक़ाज़ा
है लोग कहते हैं बनाएं
रख्खें आनाजाना,
दिल को यूँही
बहलाए
रखिए
कि
एक दिन पहुंच ही जाएंगे आकाशगंगा
के किनारे, यूँ तो आज नहीं ज़ेब
में एक भी ढेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला । छोटी छोटी
खुशियों में रहते हैं
शामिल लंबे
उम्र के
राज़,
अंधेरे रास्तों में भी अदृश्य उजाले कहीं न
कही से देते हैं आवाज़, उम्मीद का
ऐनक चाहे जितना लगे धुंधला
मन की आंखे कभी नहीं
होती अंध, जीने की
अदम्य ख़्वाहिश
में छुपी रहती
है एक
अनाम गंध, अनवरत चलता रहता है - -
जीत हार का रहस्यमय खेला, शून्य
में थमा हुआ सा लगे है सांसों
का हिंडोला ।
- - शांतनु सान्याल

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