फिर महके महुवा वन, दूर छितिज में खोया मन,
आदिम झरना, गहन अरण्य, वो चाहें
आत्म समर्पण, सजल नेह,
प्रतिबिंबित प्रणय,
उत्कंठित
सांध्य
प्रदीप, निशिपुष्प देह झकझोरे, उद्वेलित बाह्य
अंतर दर्पण। आग्नेयगिरी सम रह रह कर,
हिय में उठे अभिलाष, बन श्रावणी
मेघ सघन, बरसो तुम
उन्मुक्त आकाश,
अभिशापित
जीवन,
तृषित ह्रदय, सुप्त हास परिहास मुक्त करो
अप्रत्यासित, मम स्मृति मोहपाश।
प्रतिध्वनित मौन, मधु यामिनी
शेष आलिंगन बध्द देह,
छिन्न भिन्न
अवशेष,
परित्यक्त वासना, कुछ पल विशेष शून्य
जीवन परिधि, नग्न सत्य परिवेश,
प्रणय विनिमय, मधुरिम
दीर्घ क्लेश।
- - शांतनु सान्याल

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