Thursday, 12 May 2011


गहराइयाँ

बंजर, अवहेलित, भावशून्य
निषिद्ध जीवन की पृथ्वी -
विलंबित निशा क्रंदित स्वप्न
विरोधाभास करते हैं, पीछा
एक दूसरे का सतत,
वहीँ कुछ ही दूर, उस मोड़ पर
अन्य जीवन अंकुरण की ओर
है अग्रसर, गर्भित शिशु
लेता है, सांस एक भावी सम्राट
की तरह, अपनी सिद्धांतों
से वो करेगा भविष्य रचना,
यहाँ स्वप्न करता है, अट्टहास
संपूर्ण रात्रि -
करीब ही
उस द्वार के भीतर, एक
व्यसनी पति पूछता है प्रमाण
बच्चे के पिता का, बरसों पहले
उसने ही पत्नी को किया था मजबूर
अनैतिक सम्बन्ध के लिए,
यहाँ गर्भित शिशु अँधेरे में खोजता है
टूटे हुए सांसों की डोरी,
स्वप्न हर हाल में जीती है,ज़िन्दगी,
रात रुके न रुके, सुबह खड़ी है लेकिन
क्षितिज पर -

--- शांतनु सान्याल  

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