Monday, 27 May 2013

सुलहनामा - -

न जाने क्या था दिल में उसके, मुझे न थी 
ख़बर ज़रा, उन आँखों ने मुझे ले 
डूबा न जाने कहाँ, इक 
अंतहीन सफ़र 
और दूर
है किनारा, बहरहाल अब तेरी महफ़िल में 
लौटना है मुश्किल, अब कोई आवाज़ 
छूती नहीं मुझको, न कर यूँ 
टूटकर इंतज़ार लौटती 
सदा का !
अभी तलक है जवां वादी ए ज़िन्दगी, फिर 
कोई सुलहनामा पे कर ले दश्तख़त,
कि दहलीज़ पे रुका रुका सा 
है मौसम ए बहार, न 
कर यूँ फ़रेब
ख़ुद से,
कि ज़िन्दगी का सफ़र नहीं इतना आसां - -
* * 
- शांतनु सान्याल 
art by MAILEE FORD
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/