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Saturday, 7 April 2018

रिक्त वक्षस्थल - -

दोनों किनारे हैं धूसर, दोनों तरफ रेत के समंदर,
ढलती उम्र की बस्ती है सूखे नदी के अंदर।
न जाने किस देश उड़ गए सभी बया -
पाखियों के झुण्ड, उदास से हैं
तटबंध के बबूल वन, सिर्फ़
झूलते हैं टहनियों के
नीचे कुछ शून्य
नीड़ पिंजर।
जीवन -
नदी की है अपनी ही अलग कहानी, कुछ मौन -
कथानक झुर्रियों में हैं क़लमबन्द, कुछ
सजल वृत्तांत पथराई आँखों की
जुबानी। ऋतुओं की तरह
हैं रिश्तों के बहाव,
कभी दोनों
किनारे
लहरों से बंधे, और कभी अंजुरी न पाए एक भी
बूँद पानी। जीवन नदी की है अपनी ही
अलग कहानी।

* *
- शांतनु सान्याल