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Thursday, 22 March 2018

शेष पहर - -

बहुत दूर जहाँ नदी मुड़ जाती है अनजान
द्वीप की ओर, और किनारे खो जाते
हैं निविड़ अंधकार में, जीवन तब
खोजता है अपनी परछाइयां,
कुछ जीत में कुछ हार
में। धूप का धुआँ
ही था तुम्हारा
अपनापन,
दिल से उठा या देवालय से, तर्क है बेमानी,
मानों तो सब कुछ है यहाँ, और ग़र न
मानों तो कुछ भी नहीं इस संसार
में। जिन्हें उतरना था घाट पर
वो कब से उतर गए, शून्य
नौकाओं के सिवाय
अब कुछ भी
नहीं इस
पार में। ईशान कोण में फिर उभर चले हैं -
आवारा बादल, शेष पहर शायद बिखर
के बरसें, और सुबह हो जागृत
दोनों प्रणय कगार में। 
जीवन तब खोजता
है अपनी
परछाइयां, कुछ जीत में कुछ हार में। - -

* *
- शांतनु सान्याल