Friday, 21 March 2014

कहीं न कहीं - -

हर इक नज़र को चाहिए ख्वाबों की 
ज़मीं, हर इक के दिल में होता 
है, सहमा सहमा सा 
बचपना कहीं 
न कहीं, 
बुरा इसमें कुछ भी नहीं, कोई लम्हा 
जो बना जाए ज़रा सा जुनूनी !
हर इक वजूद में होता है, 
गिरना सम्भलना 
कहीं न 
कहीं, कोई नहीं दुनिया में इंसान - -
कामिल, हर शख्स चाहता है 
छद्म मुखौटे से निकलना
कहीं न कहीं, 
फ़लसफ़ों 
की वो 
उलझन भरी बातों से ज़िन्दगी नहीं 
गुज़रती, हर दिल चाहता है 
यहाँ,ज़रा सा बहकना 
कहीं न कहीं !

* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
dreamy pastel