Saturday, 16 February 2013


ख़्वाब नए - -

न फ़लक, न ज़मीं, हद ए नज़र, ये 
कैसा इदराक दिल में है छाने 
चला, इक ख़ालीपन 
है हर सिम्त, 
ग़ैर 
मुन्तज़िर कोई नादीद अब्र, हो - -
जैसे बेक़रार सा, बिखर 
जाने को,ये कैसा 
जज़्ब तासीर 
है उनकी  
निगाहों का, हर शै है कोहरे में डूबा 
हुआ इक सिवाय उन 
झिलमिलाते 
साहिल 
ए पलक, कि हर बार ज़िन्दगी - - 
उभर आती है मुक़्क़दस
सीडियों के किनारे,
वो पोशीदा 
हाथ 
मुझे कभी डूबने नहीं देते, हर बार 
जल उठते हैं उदास, चिराग़ -
ए शब लिए सीने में,
सुलगते ख़्वाब
नए - - 
* * 
- शांतनु सान्याल
 http://sanyalsplanet.blogspot.com/
Vases by artist by Beth Roberson