25 फ़रवरी, 2026

झूलता दालान - -

असंख्य बसंत गुज़रे छू कर

इस झूलते दालान को,
अनगिनत बार
देखा है
लड़खड़ाते सूरज के अवसान
को, उड़ान पुलों की रफ़्तार
रुक जाती है आधी रात,
कोई याद नहीं
करता
शलभ के मूक बलिदान को,
सुबह से पहले झर
जाते हैं गंधहीन
रजनीगंधा,
छोड़
जाती है चाँदनी ज़मीन पर
निढाल देह प्राण को,
रात लौट जाती
है किसी
दूरगामी रेल की तरह अज्ञात
गंतव्य की ओर, दूर तक
निविड़ कोहरा निगल
जाता है ख़्वाबों
के मरुद्यान
को,असंख्य बसंत गुज़रे छू
कर इस झूलते
दालान को ।
- - शांतनु सान्याल

20 फ़रवरी, 2026

बस यूँ ही - -

बस यूँ ही खड़े हैं हमें किसी

का इंतज़ार नहीं, वक़्त
दौड़ रहा है लेकिन
अब वो रफ़्तार
नहीं, उम्र
भर
बुनते रहे मुहोब्बतों के हसीन
पैरहन, उतरन हर सिम्त
जिनका कोई तलबगार
नहीं, कोहरे से
झाँकती हैं
गुमशुदा
फूलों
की वादियां, गुलदस्ते सजे हुए
दूर तक बस ख़रीददार नहीं,
हवाओं में आज भी है
इक अजीब सी
कशिश, इत्र,
शीशा है
सामने
फिर
भी दिल बेक़रार नहीं, कुछ लोगों
का ठिकाना मानचित्रों में नहीं
होता, दिलों में बसने वालों
को कैसे कहें असरदार
नहीं, एक अदद तन्हा
मुसाफिर मैं ही
नहीं ज़माने
में, जाना
तो है
एक दिन सभी को अभी मैं तैयार
नहीं, बस यूँ ही खड़े हैं हमें
किसी का इंतज़ार
नहीं ।
- - शांतनु सान्याल


 

16 फ़रवरी, 2026

टूटे पंख - -

क़दमों के निशान दूर जा कर

खो जाएंगे कहीं, किनारे
का बिखराव कोई
मुड़ कर देखता
नहीं, बारहा
एक ही
सवाल
और
लाजवाब ये ज़िंदगी, धुआँ
धुआँ सा हर तरफ फिर
भी रात अधजली,
चंद्र बिम्ब को
छूना चाहती
हैं रंगीन
मछलियां, अदृश्य जाल है
जानलेवा बुझती नहीं
दिल की लगी,
शून्य घरौंदें
तकते रहे
आसमां,
उड़
चुके प्रवासी पखेरु,धरातल
में बिखरे पड़े हैं कुछ
स्वप्न सप्तरंगी ।
- - शांतनु सान्याल

15 फ़रवरी, 2026

सतह के ऊपर - -

डूबने से पहले मुस्कुराया था

सजल शामियाना, गहन
स्रोंतों के मध्य भी
ज़िन्दगी ने न
हार माना,
लहूलुहान पाँव चल कर भी
उभरता है अस्तित्व,
क्षत विक्षत देह
के अंदर
छुपा
था दिव्य ख़ज़ाना, उस अदृश्य
देवालय के द्वार कभी बंद
नहीं होते, ज़रूरी है
सही समय उस
गंतव्य पर
पहुंच
पाना,
अंतरतम के अतल तक पहुंच
पाना आसान नहीं, बहुत
सहज है किसी के
माथे को यूँ ही
सहलाना ।
- - शांतनु सान्याल

10 फ़रवरी, 2026

एक ही जीवन - -

एक ही जीवन था किसी आदिम संदूक की

तरह, कभी सिर पर तो कभी कांधे
में थामे हम गुज़रते रहे, कहने
को यूं तो बहोत सारे थे
रुकने के ठिकाने,
उम्र भर का
संधिपत्र
रहा
निरर्थक, हमक़दम रह कर भी एक दूसरे से
हम रहे अनजाने, कुछ स्मृतियाँ ओझल
होती रहीं कुछ ख़्वाब टूट कर भी
महकते रहे, एक ही जीवन था
किसी आदिम संदूक की
तरह, कभी सिर पर
तो कभी कांधे में
थामे हम
गुज़रते
रहे ।
सफ़र में कोई किसी का बोझ नहीं ढोता,
बेहतर है ख़्वाहिशों की गठरी रहे
सीमित, बहुत कम फ़ासला
रहता है अक्सर दरमियान
धूसर और हरित, कभी
अतीत के अल्बम
निहारते और
कभी सब
कुछ
जानबूझ कर बिसरते रहे, एक ही जीवन
था किसी आदिम संदूक की तरह,
कभी सिर पर तो कभी कांधे
में थामे हम
गुज़रते
रहे ।
- - शांतनु सान्याल

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