10 फ़रवरी, 2026

एक ही जीवन - -

एक ही जीवन था किसी आदिम संदूक की

तरह, कभी सिर पर तो कभी कांधे
में थामे हम गुज़रते रहे, कहने
को यूं तो बहोत सारे थे
रुकने के ठिकाने,
उम्र भर का
संधिपत्र
रहा
निरर्थक, हमक़दम रह कर भी एक दूसरे से
हम रहे अनजाने, कुछ स्मृतियाँ ओझल
होती रहीं कुछ ख़्वाब टूट कर भी
महकते रहे, एक ही जीवन था
किसी आदिम संदूक की
तरह, कभी सिर पर
तो कभी कांधे में
थामे हम
गुज़रते
रहे ।
सफ़र में कोई किसी का बोझ नहीं ढोता,
बेहतर है ख़्वाहिशों की गठरी रहे
सीमित, बहुत कम फ़ासला
रहता है अक्सर दरमियान
धूसर और हरित, कभी
अतीत के अल्बम
निहारते और
कभी सब
कुछ
जानबूझ कर बिसरते रहे, एक ही जीवन
था किसी आदिम संदूक की तरह,
कभी सिर पर तो कभी कांधे
में थामे हम
गुज़रते
रहे ।
- - शांतनु सान्याल

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past