Sunday, 22 March 2015

कच्ची माटी की दुनिया - -

तुम्हारी सुबह मेरी सुबह से है अलग बहोत,
मेरे सामने हैं कुछ मिट्टी के बर्तन,
और एक अदद, काठ का
पहिया, तुम्हारे
सामने हैं
बिखरे हुए कांच के टुकड़े, और बेतरतीब - -
रेशमी कपड़े, कुछ बेरंग सिलवटें !
कुछ ख़्वाब बदगुमां, मुझसे
मुख़ातिब हैं कुछ
थकन भरे
चेहरे लेकिन शिकस्ता नहीं, जिस आख़री
छोर पे, तुम्हारा उड़ान पुल रुक
जाता है हाँपता हुआ, ठीक
उसी जगह से मेरा
सफ़र करता
है शंखनाद ! और यही वजह है कि मैं कभी
मिटता नहीं, कभी थकता नहीं, कभी
रुकता नहीं, कच्ची माटी की है
मेरी दुनिया, जिसे टूटने
का कोई ख़ौफ़
नहीं होता,

* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
Demetra Kalams Watercolors

Friday, 13 March 2015

अभी अभी - -

है कोई ख़्वाब ख़ूबसूरत या तूने
अभी अभी, छुआ है मुझे
बेख़ुदी में, जो भी हो
रहने दे यूँ ही,
ये भरम
बरक़रार, कि अभी अभी मेरी -
पलकों पे है, झुकी हुई सी
तेरे रुख़ की परछाई,
अभी अभी
बेतरतीब टूट के बिखरे हों गोया
कुछ नाज़ुक बादलों के
साए, सुलगते
सीने में
फिर अचानक उभरा है कोई - -
लापता मरूद्यान !

* *
- शांतनु सान्याल



http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
Glennda Field Fine Art.jpg 2.jpg

उसी एक बिंदु पर - -

हर नज़र जा के रूकती है उसी एक बिंदु पर,
कहने को हर एक का नज़रिया है अलगाना,

कहाँ तू भी है आज़ाद, दुनिया के बंधनों से -
मेरे जीवन का भी कहाँ  है दीगर अफ़साना,

यक़ीनन हर कोई बह रहा है वक़्त के साथ,
किसे ख़बर कहाँ है सागर और कहाँ मुहाना,

दो काँटों के दरमियां है सिमटी हुई ज़िन्दगी,

मिलना बिछुड़ना तो है इक ख़ूबसूरत बहाना।
* *
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
Glennda Field Fine Art.jpg 1

Wednesday, 11 March 2015

हलफ़नामा - -

उसकी चाहत का मुतालबा,
ज़िन्दगी से है कहीं
ज़ियादा, बहुत
मुश्किल
 है निभाना, मुख़्तसर उम्र में
इंतहाई वादा, जो भी हो
अंजाम ए सफ़र,
अब लौटना
नहीं
मुमकिन, हमने तो कर दिए
दस्तख़त बिन देखे, बिन
पहचाने ! कौन  है
मुजरिम
और
कौन भला मासूम, दिल का भेद
ख़ुदा बेहतर जाने।

* *
- शांतनु  सान्याल
 

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
mary maxam painting.jp.jpg

Monday, 9 March 2015

फिर कभी पूछ लेना - -

फिर कभी पूछ लेना, नम आँखों के राज़,
दीर्घ अंतराल के बाद मिलो हो तुम आज,

उम्र का तक़ाज़ा है, या बेवक़्त सिलवटें -
न रहा आईने को भी मुझसे कोई ऐतराज़,

न देख मुझे, यूँ हैरत भरी नज़र से दोस्त,
रोके रुकते नहीं बेरहम वक़्त के परवाज़,

तेरी निगाह में अब तलक है महक बाक़ी
क्या हुआ कि ज़माने से हूँ मैं नज़रअंदाज़,

न लौटने का सबब जो भी हो उनके साथ,
यूँ तो बेइंतहा हमने, दी थीं उन्हें आवाज़ !

- शांतनु सान्याल 

 http://sanyalsduniya2.blogspot.in/