Tuesday, 21 July 2015

शब ए इन्तज़ार - -

शब ए इन्तज़ार ढल गई,
दूर तक बिखरे पड़े हैं
बेतरतीब, टूटे
हुए ख़्वाब।
कुछ उनींदी आँखों की
वीरान बस्तियाँ,
और कुछ
कोहरे
में लिपटी ख़मोशियाँ।
लगा के आग,
ख़ुद अपने
अंजुमन

में कि
हम ढूंढते हैं बारिश,
भरे सावन में।
तमाम रात
जलते
बुझते रहे मेरे जज़्बात 
उम्र से लम्बी थी
कहीं कल 
बरसात
की
रात। हर इक  आहट
में टूटती रही
जंज़ीर ए
नफ़स,
हर
इक पल बिखरते रहे
इश्क़ ए गुलाब।
शब  ए 
इन्तज़ार ढल गई, दूर
तक बिखरे पड़े हैं
बेतरतीब,
टूटे
हुए ख़्वाब - -

* *
- शांतनु सान्याल 

 http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
शब - रात