Wednesday, 13 February 2013

अभिलाष चिरंतन - -

अशेष कहाँ, ये अभिलाष चिरंतन
उस छवि में निहित जीवन मरण,
प्रति पल प्रगाढ़ झंझावात, प्रति -
क्षण सम्मुख,एक खंडित दर्पण।

उदय अस्त, अहर्निश निरंतरता
पुष्पित मन, कभी बिन आवरण, 
मृगजल या मायावी प्रणय गंध -
नीरव, कभी अधीर अंतःकरण।

तृषित नेत्र व्याकुल देखे चहुँ दिश 
न ही निद्रित, न ही पूर्ण जागरण,
सत्य-असत्य या कोई दृष्टी भ्रम 
अज्ञात यात्रा दे, पुनः आमन्त्रण।
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by Maura Cowan