Friday, 17 June 2011

नज़्म
कहाँ से आतीं हैं,
कराहों में डूबी ये आवाज़ें -
कि ज़िन्दगी बेमानी हुई जाती है,
कहाँ कोई फिर आईना है
टूटा, कि अक्श है मेरा
फिर बिखरा हुआ,
शाम है रंगीन, चिराग़ों से उठती
हैं, मजरूह सी रौशनी क्यूँ
न जाने कौन फिर किस मोड़ पे
किसी के लिए, दिल
की दुनिया लुटाये बैठा है,
वो तमाम उदास चेहरे खड़े हैं
उस चौक में किसी की इक झलक
पाने की उम्मीद लिए हुए -
सुना है वो कोई मसीहा था लेकिन
ज़माने ने उम्र से पहले उसे
सलीब पे चढ़ा दिया,
वो इश्तेहार जो मौसम ने बारहा
चिपकाया था वादियों में
कि लौटेंगी बहारें इक दिन
हमने इंतज़ार में तो उम्र गुज़ार दी
न देखा किसी को मुस्कराते
इक मुसलसल मकबरा ए ख़ामोशी
के सिवाय कुछ भी तो न था
लोग कहते रहे यहीं पे कहीं हैं
फ़िरदौस की सीड़ियाँ, धुंध में डूबे
हुए थे सभी रास्ते, हम ने
कहीं तुम्हें देखा नहीं, घाटियों में
दर्द का धुआँ सा उठता रहा,
कराहों  की बस्तियां जलती रही
आईने टूटते रहे, चिराग़ बुझते रहे
सुबह कभी तो लाये  मुस्कराने का
सबब, हर शख्स ज़रा जी
तो ले मुख़्तसर ज़िन्दगी,
--- शांतनु सान्याल