Friday, 31 December 2010

नया आभास

नव आभास / नव वर्ष की अनेकों शुभकामनाएँ
नेह रेखाएं कुछ अर्थ छुपाएँ
कह गए निश्पलक मन की बातें
थमी थमी सी घटायें पर्वत पर्वत
बिंदु बिंदु फिर बरसना चाहें
इस सघन रात में
 विगत रहस्य न खोलें
अधर रहें मौन नयन बने सेतु
उन्मुक्त करो अतीत पिंजर
बोझिल साँसें हैं व्याकुल उड़ जाने को
मनुहार ह्रदय का मानो
कुछ मुस्कान बिखरे, निशि पुष्प
हैं आतुर खिल जाने को
दूर बिहान प्रतीक्षारत है लिए
कोमल धूप तन मन में
इस क्षण में तुम यूँ निश्तब्ध रहो न
नव प्रणय स्वीकार करो
जीवन प्रवाह अविरल गतिमय
इस सरल पथ को वक्र रेखाओं
से मुक्त करो
जो कल था वो आज नहीं
आज न कल न होने दो
इस पल में फिर स्वप्न मधुर
बो लेने दो ---
इतना भी न सोचो की चाँद ही
ढल जाये प्राची में
क्षणिक ही सही चंद्रिमा के कुछ
कण चुन लें, महकती सांसों को
घुल जाने दो
अभिनव  आभास जीवन में
आने दो ---
----- शांतनु सान्याल

Monday, 27 December 2010

ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत है,

शेष प्रहर रात्रि, अभी अभी एक द्रुतगामी रेल,
विक्षिप्त की तरह काँस फूलों के बीच,
शुभ्र ज्योत्स्ना को चीरती हुई सुदूर किसी,
वन्य नदी के जलधाराओं को पृथक करती,
धड धडाती हुई, निष्ठुरता के साथ क्षितिज को
भेदती, कमलिनी के आलिंगनबद्ध वृन्तों को
थरथराती, झील के स्थिरता को झकझोरती,
नीलाभ्र आलोकित स्वप्नों को चूर करती, न
जाने कहाँ किस गंतव्य की ओर यूँ दौड़ गई

जैसे कोई महाकाय सरिसर्प समुद्र से सहसा
विकराल अग्निमुखी बन अम्बर को निगल
जाना चाहे, और चन्द्र तारक अन्तरिक्ष में
एक दूसरे से यूँ जा मिलें जैसे मालती लताएँ
सहस्त्र प्रसूनों को श्रृंखलित करना चाहें,
एकाकी व्यक्तित्व सहमा सहमा कई बार
खिडकियों से उस रेल के गुज़रने को देखता,
और फिर फर्श में बिखरे हुए टूटे तारों को
इकठ्ठा करता, गुनगुनाता है - ज़िन्दगी कितनी
ख़ूबसूरत है, आइये आपकी ज़रूरत है ------
---- शांतनु सान्याल
 स्वरचित चित्र

Sunday, 26 December 2010

ख़ुदा हाफिज़

सलीब तो उठाली है,
 ज़िन्दगी न जाने और क्या चाहे 
मुझे बिंधते हैं वो तीर व् भालों से 
बेअसर हैं तमाम सज़ाएँ , मैं बहुत पहले 
दर्द को निज़ात दे चुका, पत्थर से मिलो 
ज़रूर मगर फ़ासला रखा करो, 
न जाने किस मोड़ पे क़दम  डगमगा जाएँ,
वो ख़्वाबों की बस्तियां उठ गईं 
मुद्दतों पहले, हीरों के  खदान हैं 
ख़ाली, सौदागर लौट चुके ज़माना हुआ 
दूर तलक है मुसलसल  ख़ामोशी 
बारिश ने भर दिए वो तमाम खदानों को 
वक़्त ने ढक दिए, धूल व् रेत से 
वो टूटे बिखरे मकानात, कहाँ है 
तुम्हारा वो गुलाबी रुमाल, फूल व् 
बेल बूटों से कढ़ा हुआ मेरा नाम ,
कभी मिले ग़र तो लौटा जाना 
आज भी हम खड़े हैं वहीँ, जहाँ  
पे तुमने ख़ुदा हाफिज़ कहा था इकदिन, 
---- शांतनु सान्याल 













Thursday, 23 December 2010

नज़्म

नज़्म
ये माना कि ज़िन्दगी में हर ख़ुशी नहीं
 मिलती, हर्ज़ क्या हैं आखिर मुस्कराने में,
हासिये में थे हम  ये सच है, बावजूद
वक़्त लगता है ज़रा, तूफ़ान गुज़र जाने में,
किसी ने नहीं देखा हवाओं का दम घुटना
भीगी ख़ुश्बू का बहाना बना गए हम,
छलकते आँखों में थे ज़ख्म बेक़रां
सिसकतीं साँसों का तराना बना गए हम,
रिश्तों की बारीकियां हमसे न पूछो
टूटतीं हैं साँसें हर बार साहिल से लौट कर,
चाँद की रौशनी हरगिज़ कम न थी
बिखरे हैं दर्द लेकिन बारहा दिल से लौट कर /
-- शांतनु सान्याल 

Sunday, 19 December 2010

लकीरें

आकाश पार बहती हैं अदृश्य
कुछ सप्तरंगीय प्रवाहें,
एक स्वप्नमयी पृथ्वी शायद
है कहीं अन्तरिक्ष में,
सुप्त शिशु के मंद मंद मुस्कान
में देखा है उसे कभी,

नदी के बिखरे रेत में
किसी ने लिखा था पता उसका
बहुत कोशिश की, पढ़ पायें!
लकीरें जो वक़्त ने
मिटा दिए, चेहरें में उभर आयीं
काश ! उठते ज्वार की
लहरें इन्हें भी बहा लेतीं,

अर्घ्य में थे कुछ शब्द
जो कभी वाक्य न बन पाए
कुछ बूंदें पद चिन्हों में
सिमट कर खो गए वो
कभी मेघ न बन पाए
सुना है ये नदी गर्मियों में
कगार बदल जाती है फिर
कभी मधुमास में मिलेंगे तुमसे !
--- शांतनु सान्याल

Sunday, 12 December 2010

जो हमें चाहे टूट कर

गिरते पत्तों ने हमारी अहमियत बयां की है 
हमें इसका ज़रा भी अफ़सोस नहीं होता,
चेहरे में हमने भी जड़ ली है रंगीन मुखौटे 
लहरें थमीं सी लगे, हर शै ख़ामोश नहीं होता 

तुम्हारीनिगाह से ज़माने को है, क्या लेना 
हर शख्स की अपनी मुख्तलीफ़ है दुनिया,
तुम चाहो जियो हर लम्हा ख़ुद के तस्सवुर से 
हमारी नज़र में कुछ बेतरतीब  है दुनिया,  

हमारी मंज़िल सिर्फ तुम तक आ नहीं रूकती 
ज़ेहन में हैं न जाने अनगिनत ख़्वाब कितने,
तुम इश्क़ में ज़िन्दगी को मुकम्मल समझे 
सवालात तो हैं बहुत लेकिन लाजवाब कितने, 

जो दिखाई दे नज़र के सामने रूबरू जाने जाँ
हम तो सिर्फ उस नाचीज़ की बंदगी करेंगे,
तुम चाहो तो कोई और फ़लसफ़ा इज़ाद करो
जो हमें चाहे टूट कर,उसके नाम ज़िन्दगी करेंगे, 

---- शांतनु सान्याल 


Saturday, 11 December 2010

सीने में डूबता कोई माहताब देखा होगा

१. नीचे है, अथाह खाई लो मैं खड़ा हूँ
किनारे, क्या है दिल मेंतुम्हारे ख़ुदा जाने,
बेपरवाह ये  ज़िन्दगी यूँ ही गुज़र जाये
सामने हो तुम, उम्र है कितनी  ख़ुदा जाने /


२. ओष की बूंदें थीं या दर्द के क़तरे
पंखुडियां गुलाब की क्यूँ झुक सी गयीं,
कोई जिस्म पे चला है दहकते पांव
देखते ही उनको सांसें क्यूँ रुक सी गयीं /

३. हमने तो उम्र का बिछौना दे दिया
सर्दियाँ थीं सदीद, चादर नाकाम रही,
तुमने ओढ़ ली ऊनी तश्मीना कम्बल
 यहाँ सिहरन भरी सुबहो शाम रही

४. मुस्क्रुराने के लिए कोई तो सबब होता
क्या करें बेवजह ही मुस्करा गए,
अश्क छुपाना भी इक सलाहियत है
जान करभी हम दरवाज़े से टकरा गए

५. लोग जो हँस पड़े हमने भी साथ दिया
किसलिए इतनी ख़ुशी थी मालूम नहीं,
हम ख़ुद को तलाशते रहे या उनको
ज़िन्दगी थी या ख़ुदकुशी मालूम नहीं

६.  भीड़ में भी थे सहमे सहमें तन्हां तन्हां
किसी ने  पुकारा ज़रूर,पहचान न पाए,
कब तन्हाईयाँ घिर आयीं घटा बन कर
भीगते गए लेकिन हम उन्हें जान न पाए

७. लबों को किसी ने छुआ ज़रूर था
बंद पलकों ने कोई ख़्वाब देखा होगा
गर्म सांसों में नमी  घोल गया कोई
सीने में डूबता कोई माहताब देखा होगा /
---- शांतनु सान्याल

Friday, 10 December 2010

इक बूंद

पिछले पहर हमने भीगे गुलों में
कोई अनजान सी छुअन देखी है,
न जाने कौन छू सा गया दिल को
सीने में मीठी सी चुभन देखी है,
अधखुली किताब में  बिखरे आंसू
हर लफ्ज़ में हमने अगन देखी है,
 भरम कि तुम हो हमारे,रहने दो
खंडहर में हमने  मधुबन देखी है,
ढल गया चाँद कब पता न चला
ख़ामोश शब,होलीसीदहन देखी है,
वजूद अपना हम कहीं भूल सेगए   
इक बूंद की तरह यहाँ जीवन देखी है,
--- शांतनु सान्याल

Wednesday, 8 December 2010

अभी अभी,

इस अहसास में कितने दिए जल उठे
गुज़रे हैं वो बहुत  क़रीब से अभी अभी,
देखा है टूटते तारों को बहुत दूर से
मिले हैं वो बड़े  नसीब से अभी अभी,
महके हैं क़फ़स के दरो दीवार
 आये कोई पार, दहलीज़ से अभी अभी,
फिर सजाएँ कोई ख़्वाब  आँखों में
देखा है उसने, नज़दीक से अभी अभी,
बहुत मुश्किल था आह भरना मेरा
मिले है हम ज़िन्दगी से अभी अभी,
हर फूल लगे ख़ूबसूरत दिल की तरह
भरा है जिस्म ताज़गी से अभी अभी,
लबरेज़ हैं ख्वाहिशात छलकने को
राहतमिली है तिश्नगी से अभी अभी ,
बहकते हैं क़दम होश न हो जाय गुम
मिले हैं जाने अज़ीज़ से अभी अभी //
-- शांतनु सान्याल

Sunday, 5 December 2010

जिस्म को हमने जला दिया

१.जिस्म को हमने जला दिया
मुक़दस आग की तरह,
तुमने ग़र न देखा धुआं
अक़ीदत का  क्या कसूर
हमने ख़ुद को मिटा दिया
अनचाहे  बैराग की तरह,

२.कहाँ से लायें वो यकीं
जो ख़ुदा को लाये सामने
हमने ख़ुशियाँ मिटा दी
उजड़े सुहाग की तरह,

३.तुम्हारे इश्क़ में खो सी
 गयीं,हमारी पहचान
दिल में छुपाये रखा
तगाफुल अनमिट दाग़ की तरह

४.इस जुस्तज़ू में उम्र कट गई
के लौटेंगे बहारें एक दिन
हैं सदियों से बिखरे अरमां
सूखे वीरां किसी बाग़ की तरह

५.फूलों के मौसम आये गए
आसमां रंग बदलता रहा
हमने ख़ुद को भुला दिया
पुराने नगमा-ऐ-राग की तरह
जिस्म को हमने जला दिया
 मुक़दस आग की तरह //
-- शांतनु सान्याल

Saturday, 4 December 2010

भूमिगत ग्रंथियां

भूमिगत ग्रंथियां भित्तियों को पार
कर गईं, नीड़ की दरारें पूछती हैं
कहाँ व् कैसे तिनकों में परकीय
भावों ने घर किया, हमें तो  पता
ही न चला, हमने तो प्रणय ईंटें
क्रमशः बड़े ही कलात्मक शैली में
सजाया था, सपनों के गारे से,
खिडकियों से झाँकतीं कृष्ण कलि
के फूलों ने कहा- शायद प्रीत में
थी सजलता ज्यादा या अश्रु ही
मिलाना भूल गए, दरारों में भी
जीवन थे, हमने महसूस किया
आत्मीयता की साँसें गिरती
उठतीं हों, जैसे असमय हो जाये
मोहभंग, ग्रंथियों के जनक थे
अपने अति प्रिय, हमने बड़े स्नेह
से उन्हें रोपण किया, सूर्य व्
वर्षा से बचने के लिए, दालान
में थे वो सभी अब तक, लेकिन
कब व् कैसे जड़ों ने आधार भेद,
गृह प्रवेश किया, ये सोच पाते
कि फर्श में स्वप्न हाथों से छूट
कर यूँ बिखरे, जैसे कोई अमूल्य
फूलदानी टूट जाये अकस्मात् -
-- शांतनु सान्याल

अहम् अनंत स्वप्न पश्यामि

आलोक छायामय नदी वक्ष स्थल
झुके हैं वट शाखा प्रशाखा, जटाएं,
मालविका वन, तट से कुछ दूर है,
अहंकार यहाँ मृत्युमुखी, अहम् 
अनन्त पृथ्वी पश्यामि - उद्घोषित 
मन्त्र कहीं विलीनता को दर्शायें,
पुनर्जीवित हों सभी सुप्त इच्छाएं 
जागृत हों स्वप्न जो नदी ने ग्रास 
किये श्रावणी अझर वृष्टि पूर्व, 
देह धरणी, अतृप्त कामनाएं जो 
मायाजाल बिछाएं प्रति क्षण,
विछिन्न्तायें बैराग के संकेत नहीं 
होते, जीवन चक्र गतिमय प्रतिपल, 
तटिनी सम ह्रदय लिए देखूं 
एक तीर धूम्रमय पार्थिव शरीर 
दूसरे कूल नव किशलय गर्भित,
मध्य श्रोत अज्ञात,अदृश्य किन्तु 
प्रवाहित जलराशि चिर गतिमान,
यहीं अभिनव सृष्टि  का उदय 
अहम् अनंत स्वप्न पश्यामि,
--- शांतनु सान्याल 


  

Friday, 3 December 2010

खुद से बाहर कभी,यूँ निकल ही न सके

 ख़याल कि छूट न जाएँ हम कहीं दुनिया की  भीड़ में
 खुद से बाहर कभी,यूँ  निकल ही न सके /

आधी रात किसी ने दी है, कांपती हाथों से दस्तक
सांसों की तपिश, हम पिघल ही न सके /

वो जो कहते हैं, हमसे बेशुमार मुहोब्बत हैं उनको
बारहा चाहा, सांचे में कभी ढल ही न सके /

धनक ने तो बिखेरी हैं रंग ओ नूर उम्र भर ऐ दोस्त
बेमुराद दिल है कि हम मचल ही न सके /

उनकी आहट में भी ख़ुशबू ऐ चमन होता है अक्सर
संदल की तरह मंदिर में बहल ही न सके /

धूप दीप तुलसी शंख की आवाज़े हमें बुलाये हर बार
न जाने क्या नमी है चाह कर जल ही न सके  /

सुलगती  हैं धीमी धीमी लौ से कोई आग सीने में
सारी नदी  है आगे, इक बूंद भी निगल न सके/

बिल्लोरी बदन ले के जाएँ  कहाँ पत्थर के शहर में
ख़ूबसूरत ख्वाबों से,खुद को बदल ही न सके/

खुद से बाहर कभी,यूँ  निकल ही न सके/
---- शांतनु सान्याल

धुँध की गहराइयाँ

धुँध की गहराइयाँ या निगाहों का धोखा
लौटतीं सदाओं ने क्यूँ राह मोड़ लिया

उफ़क़ के पार थे वो सभी कांच के ख़्वाब
बर्फ़ के नाज़ुक परतों में हमें छोड़ दिया,
क़दमों के नीचे था आसमां या झील कोई
 चाहा दिल से खेला फिर उसे तोड़ दिया,
इक पुल जो सदियों से था हमारे बीच
पलक झपकते उसे कहीं और जोड़ दिया,
सीने में कहीं है इक गुमशुदा नदी
बहती लहरों का रूख़ तुमने मोड़ दिया,
रेत के वो तमाम घर ढह गए शायद
बड़ी बेदर्दी से जिस्त, तुमने मरोड़ दिया,लौटतीं सदाओं ने क्यूँ राह मोड़ लिया ,
--- शांतनु सान्याल

ग़ज़ल

आसमां है कुछ आज मुंह फुलाए, घने बादलों में रुख छुपाये 
बरसना है तो बरस जाओ भी,थम थम के क़हर गिराया न करो,
लटों में उलझ जाती हैं, उमर खय्याम की ख़ूबसूरत रुबाइयाँ 
कांप से जाये है तुम्हारे लब, घबरा के नज़र मिलाया न करो ,
बिखरना ही है ग़र तो समंदर की तरह साहिल को ज़ब्त करें 
मंझधार से उठे लहर की तरह, करीब आ ठहर जाया न करो,
हमने रस्मे उलफ़त, बड़ी खूबी से निभाया,ईमान की मानिंद
संगसार नहीं ये  सर्द बूंदें,हलकी बारिश में यूँ डर जाया न करो, 
निकलो भी कभी खुले मौसम में, खिलते हुए बहार की तरह,
चिलमन से झांकते हुए जाने जाँ,फूलों में रंग भर जाया न करो,
बरसना है तो बरस जाओ भी,थम थम के क़हर गिराया न करो, 
--- शांतनु सान्याल  

Thursday, 2 December 2010

पुरातन देवालय

दूर तक तैरतीं काई, जलोच्छ्वास लेते कुछ
कमलिनी जब देह बने जलासय
तट के कचनार, वन्य कुसुम, हरित तृण
बांस वन तक चाहें जल समाधि
मन्त्र मुग्ध मृग दल पिपासा लिए सहमें
कुछ पल ठहरें, अंतर्मन सरीसर्प
न जाने कब हों जागृत और ग्रास हो जाएँ,
रहस्यमयी, स्थिर जलराशि गहन
अनंत, अंधकार थाह न जाने कोई, प्रवेश
सहज, सुगम मनोहर, निर्गमन द्वार
हों जैसे अनिर्मित भ्रमित संसार
छायामय चिर धरातल, निश्वास विहीन
तलछट समेटे महादहन निशिदिन
प्रति पल अदृश्य  अग्निशिखा प्रज्वलित,
भोर में उठतीं वाष्पीकृत वेदनाएं
पर्यटक खोजें निसर्ग सौन्दर्य, ह्रदय मध्य
गिरतें  प्रति  क्षण पुरातन देवालय,
--- शांतनु सान्याल   

Wednesday, 1 December 2010

अग्नी वृत्त

 कुछ आकृतियाँ शैल चित्रों की तरह जीवन भर अर्थ
की खोज में भटकती हैं, व्यक्तित्व के परिधि में,
त्रिज्या थे वो सभी भावनाएं केंद्र बिंदु को भेद गईं
ज्यामितीय संकेतों ने छला, जीवन गणित था या
कोई महा दर्शन, हम तो केवल छद्म रूपी शतदल
में यूँ उलझ के रह गए कि निशांत का पता न चला,
क्षितिज के आँखों से जब काजल धुले, समुद्र तट
बहुत दूर किसी अपरिचित दिगंत में खो चुका,
प्रतिध्वनियाँ लौट आईं अक्सर हमने तो आवाज़ दी,
किसने किसका हाथ छोड़ा, कौन कहाँ खुद को जोड़ा
बहुत मुश्किल है,समीकरणों का शून्य होना -
किस के माथे दोष मढ़े हमने स्वयं अग्नी वृत्त घेरा,
-- शांतनु सान्याल

क्षणिका

अरण्य पथ में कुछ किंसुक कुसुम अब तक
पड़े हैं बिखरे,विगत  मधुमास की निशानी
पग चिन्हों तले  कहीं दबे हैं निसर्ग अर्घ्य
या भावनाएं, जीवन तो है लहर अनजानी
मैं डूब जाऊं उस नेह में हर बार हर जनम
प्रीत की गहराइयाँ हैं उनमें जानी पहचानी /
-- शांतनु सान्याल