18 जनवरी, 2026

शून्य का झूला - -

सुदूरवर्ती क्षितिज किनारे उठ चुका है

उत्तरायण का मेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला, कुछ ख़्वाब
रात ढले ढूंढते
हैं रेशमी
सुबह
का
ठिकाना, उन्हें मालूम है ज़िन्दगी की
मजबूरियां, रिश्तों का तक़ाज़ा
है लोग कहते हैं बनाएं
रख्खें आनाजाना,
दिल को यूँही
बहलाए
रखिए
कि
एक दिन पहुंच ही जाएंगे आकाशगंगा
के किनारे, यूँ तो आज नहीं ज़ेब
में एक भी ढेला, शून्य में थमा
हुआ सा लगे है सांसों का
हिंडोला । छोटी छोटी
खुशियों में रहते हैं
शामिल लंबे
उम्र के
राज़,
अंधेरे रास्तों में भी अदृश्य उजाले कहीं न
कही से देते हैं आवाज़, उम्मीद का
ऐनक चाहे जितना लगे धुंधला
मन की आंखे कभी नहीं
होती अंध, जीने की
अदम्य ख़्वाहिश
में छुपी रहती
है एक
अनाम गंध, अनवरत चलता रहता है - -
जीत हार का रहस्यमय खेला, शून्य
में थमा हुआ सा लगे है सांसों
का हिंडोला ।
- - शांतनु सान्याल

09 जनवरी, 2026

रात्रि ढलान - -

ख़ामोश दुआओं की तरह पहाड़ तकता है

नीलाकाश, कुछ नीरव श्लोक
गुनगुनाते हैं विशाल वृक्ष,
अनंत निस्तब्धता है
अरण्य नदी के
आसपास,
सुदूर
पहाड़ों के उस पार निस्तेज सूर्य डूब चला
अंध घाटियों में जाग रहा है हिंस्र
संसार, ज़िन्दगी दौड़ रही है
बेतहाशा मृग - आर्तनाद
के समानांतर, सुबह
की तलाश में है
वक्षःस्थल
का
बहता हुआ निःशब्द निर्यास, ख़ामोश -
दुआओं की तरह पहाड़ तकता है
नीलाकाश । अभी तुम हो मेरे
सम्मुख,या छायापथ है
बिखरा हुआ असीम
आकाशगंगा की
तरह, नयन
बिंदु में
बह
रहे हैं अविरल आलोक स्रोत, कायाहीन
उड़ रहे हैं ख़्वाहिशों की तितलियाँ,
कदाचित हम लांघ आए बहुत
पहले ही अंध गलियां,
रात ढलते ढलते
महसूस हो
चला है
पुनर्जीवन का आभास, ख़ामोश दुआओं
की तरह पहाड़ तकता है
नीलाकाश ।
- - शांतनु सान्याल 

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