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Friday, 5 May 2017

मौन आर्तनाद - -

तमाम लेनदेन रहते हैं निस्तब्ध से
जब उतरती है, सांझ दबे पाँव
पीपल तले, देह में लपेटे
रहस्यमयी अंधकार।
पुरातन मंदिर
के पट
जब होते हैं बंद, जीवन चक्र होता
है पुनः जागृत। सांध्य प्रदीप
के उठते धूम्र वलय
के साथ फिर
सजते हैं
राजपथ के मीनाबाज़ार। कुछ मृत
सीपों के खोल, कुछ वीरान
निगाहों के मरुस्थल,
कुछ दम तोड़तीं
समंदर की
लहरें
लिख जाती हैं गीले रेत पर जीवन
की कुछ अनकही कहानी,
कुछ अभिशप्त कथा
जो हैं यथावत
अपनी
जगह अडिग -अचल, कहने को - 
सारी पृथ्वी का रूप - रंग हो
चुका है बदल, लेकिन
नग्न सत्य है अपनी
जगह अविचल।
वही सजल
नेहों से
तकती, थकीहारी रात्रि करती है
पुनः विहान का अभिवादन,
स्व विलीन हो कर नव
सृजन की ओर
अग्रसर।

* *
- शांतनु सान्याल