Follow by Email

Friday, 19 August 2016

वसीयतनामा - -

जीवन के ये चार अध्याय हैं
अनंत चिरस्थायी, हर
हाल में है हमें
गुज़रना
इन
झूलते सोपानों से, अंतहीन
यात्रा से क्या किसी ने
है मुक्ति पायी। 
उभरते
सूरज का अपना अलग ही
है समयाकलन, शाम
ढलते ही, देह से
अधिक
बढ़ जाए परछाई। अंकुरित
बीज और शाखा -
प्रशाखाओं का
विस्तार,
कभी
प्रातः की कच्ची धूप और
कभी साँझ अलसाई।
हर तरफ हैं
टंगे हुए
नए
पुराने बेशुमार मुख़ौटे, - -
दर्पण का नग्न
वसीयतनामा
ही है मेरी
सच्चाई।
जीवन के ये चार अध्याय
हैं अनंत चिरस्थायी।

* *
- शांतनु सान्याल