Saturday, 16 July 2016

क़दम दर क़दम - -

अंततः सुबह के साथ ही वन्य नदी का
उफान भी उतर गया, सपनों की
थी रहगुज़र या दीवानापन
मेरा, छू कर अंतरतम,
वो जलतरंग सा
अहसास, न
जाने किधर गया। उनकी नज़दीकियां
यूँ तो चाँद रातों से कम न थीं,  बूँद
बूँद आँखों से नूर, यूँ रूह की
गहराइयों में उतरती
रही, ज़िन्दगी
हर पल
किसी की चाहत में यूँ डूबती उभरती - -
रही। कोई ख़ुश्बू पुरनम या कोई
छुअन शबनमी, न जाने
क्या था उसका राज़
ए तब्बसुम !
दूर तक
जैसे महके चन्दन वन और खिलते रहे
गुलाब क़दम दर क़दम।

* *
- शांतनु सान्याल