Thursday, 26 November 2015

काश - -

राज़ ए तबस्सुम न पूछ
हमसे ऐ दोस्त,
अनकहे
अफ़सानों के उनवां नहीं
होते। यूँ तो बिखरे
थे हर तरफ
रौशनी के
बूँद,
हर अक्स लेकिन नीले
आसमां नहीं होते।
न जाने क्या था
उनकी चाहतों
का
पैमाना,हर गुज़रती - -
आहट दश्त ए
कारवां
नहीं
होते। उनकी क़दमों की
आहट ने ताउम्र
सोने न दिया,
काश, ये
मेरे
दिल फ़रेब अरमां नहीं -
होते।
* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/