Tuesday, 1 February 2011

नज़्म

नज़्म
रौशनदान से उतरती सुनहरी धूप
की तरह, मुठ्ठी भर ख़ुशी मिल जाये कहीं
 दालान  के पौधों में जीने की तमन्ना जागे,
बहुत दूर न जाओ छोड़ कर यूँ तन्हां
कोई सुराग़,कोई बहाना, मिलने की आरज़ू
बेख़ुदी में ही सही इक लम्हा रख जाओ कहीं,
इस तरह न भूलो कि याद फिर आ ही न सकें
कोई निशां, कोई दस्तक, सांसों की आहट
उड़ते सफ़ेद बादलों में बरसने की मियाद
तो लिख जाओ कहीं -
यकीं कर लूँ मैं हर सूरत, जीवन बेल खुलकर
संवरना चाहे, पतझर के बाद बहारों का आना
तै हो न हो, ज़रा सा वक़्त मिले कि देख लूँ
गहराइयों कि ज़मीं, कोई वादा, कोई ख्वाहिश
गुलमोहर के शाखों में अपना पता लिख जाओ
कहीं --
--- शांतनु सान्याल