17 मार्च, 2026

विष पान - -

हर एक वक्षःस्थल है एक गहन सरोवर लेकिन

कमल नहीं खिलता हर किसी के सीने में,
कुछ कुहासों को छुपाए नयन कोरों
में हर चेहरा चाहता है सुबह का
मधुर आलिंगन, एक अद्भुत
सुख छुपा होता है जान
बूझ कर प्रणय गरल
पीने में, कमल
नहीं खिलता
हर किसी
के सीने में । वो एक अनाम नदी अपने आप में अंदर तक अनंत रहस्य छुपाए, उसमें जितना
डूबना चाहे ये जीवन, उतना ही सतह
पर उभरता जाए, जनम मरण के
इस शाश्वत अनुबंध में कहीं
रहता है एक अदृश्य
हस्ताक्षर, फिर
भी सब
कुछ भुला कर मज़ा आता है निरुद्देश्य जीने में,
कमल नहीं खिलता हर किसी के
सीने में ।
- - शांतनु सान्याल

06 मार्च, 2026

कुछ और पल - -

 
भोर के धुँधलके में बिखरे हुए हैं कपोत पंख,

एक गहन छटपटाहट के साथ रात बस
ढलने को है, सूखी नदी के दोनों
किनारे तकते रहे तृषित
नज़रों से आकाश
का सूनापन,
जीवन
की
सत्यता, अंध विड़ाल के संग बस छुपने को है,
एक गहन छटपटाहट के साथ रात बस
ढलने को है । जंग लगे देह में सुबह
की नरम धूप मधु मालती बेल
का एहसास दिलाए, जो
टूट कर बिखर गए
नयन कोर से
वही बून्द
पुनः
हृदय पुष्प खिलाए, जीने की उत्कंठा हर हाल
में गिर के संभलने को है, एक गहन
छटपटाहट के साथ रात बस
ढलने को है । लौट जाएंगे
सभी टिटहरी की तरह
सजल प्रांतर की
तलाश में,
छोड़
जाएंगे कुछ मद्धम प्रतिध्वनियां रक्तिम पलाश
में, कदाचित फिर कभी हम मिलें यूँ ही
किसी दिन अरण्य अज्ञातवास में,
कुछ देर और ज़रा जी लें बंद
पंखुड़ियों के मधुरिम
आवास में, कुछ
पल ग़र मिल
जाए, ये
ज़िन्दगी
फिर
बदलने को है एक गहन छटपटाहट के साथ
रात बस ढलने को है ।
- - शांतनु सान्याल

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