15 दिसंबर, 2025

गुफ़्तगू - -

कुछ नाज़ुक लम्हों को ढक दिया

रेशमी लिहाफ़ से, निःशब्द
बातें होती रही दो सांसों
के दरमियां रात भर,
कितने सितारे
उभरे और
डूबे हमें
मालूम
नहीं रात भर, कहकशां की ओर
यूँ ही बहते रहे सुदूर अपने
आप से, कुछ नाज़ुक
लम्हों को ढक
दिया रेशमी
लिहाफ़
से । ज़माने का क्या गढ़ने दो उन्हें
अपने उसूलों के शब्दकोश,
उन ख़ूबसूरत पलों में
आख़िर किसे
रहता है
ज़रा
भी होश, रूहों को फ़ुरसत नहीं
होती दिलों के वार्तालाप से,
कुछ नाज़ुक लम्हों को
ढक दिया 
रेशमी
लिहाफ़ से ।
- - शांतनु सान्याल

03 दिसंबर, 2025

द्विप्रहर यामिनी - -

रात्रि का दूसरा प्रहर, निःशब्द ओस पतन,

दोनों पहलुओं में है शून्यता, पंखुड़ियों
में है संचित, पूर्वाद्ध की गोपन
कथा, पलक बंद आँखों
में है समाहित सप्त -
रंगी सपन, रात्रि
का दूसरा प्रहर, निःशब्द ओस पतन । उस
मोड़ के आगे हैं कहीं गुलमोहरी रास्ते,
कुछ घुमावदार उतार चढ़ाव, एक
छुअन जो हिमायित देह को
ले जाए आग्नेय पथ की
ओर, पिघलता जाए
हिमनदी की तरह
स्तंभित तन
मन, रात्रि
का दूसरा प्रहर, निःशब्द ओस पतन । जो
पल जी लिया हमने एक संग बस वही
थे अमिट सत्य, बाक़ी महाशून्य,
आलोक स्रोत में बहते जाएं
आकाशगंगा से कहीं
दूर, देह प्राण बने
अनन्य, लेकर
अंतरतम
में एक
अनंत दहन, रात्रि का दूसरा प्रहर, निःशब्द ओस पतन ।
- - शांतनु सान्याल

02 दिसंबर, 2025

सुबह की नरम धूप - -

आदिम अंधकार से निकल कर जीवन

ढूंढता है शीतकालीन नरम धूप,
हिमनद के अंदर बसते हैं
असंख्य तरल स्वप्न,
अदृश्य स्रोत
तलाशती
है सतत अपना खोया हुआ प्रकृत रूप,
आदिम अंधकार से निकल कर
जीवन ढूंढता है शीतकालीन
नरम धूप । बोगनवेलिया
की तरह झर जाते
हैं सभी रिश्तों
के काग़ज़ी
फूल,
चेहरे की है अपनी अलग ही मजबूरी
झुर्रियों के साथ वक़्त का आईना
वसूल कर जाता है पुराने
तारीफ़ों का महसूल,
कुहासे में छुपा
रहता है
चाहतों
का
गहरा कूप, आदिम अंधकार से निकल
कर जीवन ढूंढता है शीतकालीन
नरम धूप ।
- - शांतनु सान्याल

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