Thursday, 11 January 2018

अतृप्त प्यास - -

 कुछ अँधेरे उजालों के टुकड़े, कुछ
बूंद आसमानी शायद रात
ढले छलके थे मेरे
नयन कोरों
से, या
आख़री पहर तुमने छुआ था मुझे
निशि पुष्प की तरह निःशब्द
मख़मली अहसास लिए।
कोई रेशमी सिहरन
जागी थी श्वास
तंतुओं में,
या
कदाचित, ज़िन्दगी लौट आई थी -
पुनर्जागरण की प्यास लिए।

* *
- शांतनु सान्याल