Tuesday, 30 August 2016

चलते चलते - -

यूँ तो बदलते रहे रंग ओ
नूर ज़िन्दगी के,
बेअसर रहा
लेकिन
दिल ए किताब मेरा।
अंधेरों के खेल में
कहीं सहमा
सा है
उजाला, हर हाल में है
ताज़ा, वो पोशीदा
गुलाब मेरा।
मेरी
चाहतों का पैमाना
नहीं किसी के
पास, कहने
को
सिफ़र है उम्रभर का
दस्तयाब मेरा।
लिबास ओ
किरदार
से न
आँक वजूद, ऐ दोस्त,
रहने दे अपने पास
ये मुहोब्बत
बेहिसाब
मेरा।
चाहे कोई ख़ास हो
या आम, ये राह
 है यक़ीनी,
कहीं न
कहीं मिल जायेगा वो
 इश्क़ नायाब
मेरा।

* *
- शांतनु सान्याल

Friday, 19 August 2016

वसीयतनामा - -

जीवन के ये चार अध्याय हैं
अनंत चिरस्थायी, हर
हाल में है हमें
गुज़रना
इन
झूलते सोपानों से, अंतहीन
यात्रा से क्या किसी ने
है मुक्ति पायी। 
उभरते
सूरज का अपना अलग ही
है समयाकलन, शाम
ढलते ही, देह से
अधिक
बढ़ जाए परछाई। अंकुरित
बीज और शाखा -
प्रशाखाओं का
विस्तार,
कभी
प्रातः की कच्ची धूप और
कभी साँझ अलसाई।
हर तरफ हैं
टंगे हुए
नए
पुराने बेशुमार मुख़ौटे, - -
दर्पण का नग्न
वसीयतनामा
ही है मेरी
सच्चाई।
जीवन के ये चार अध्याय
हैं अनंत चिरस्थायी।

* *
- शांतनु सान्याल

Wednesday, 10 August 2016

अनजान आदमी - -

यूँ तो नाम की तख़्ती है अपनी
जगह उभरी हुई बंद दरवाज़े
के पार मगर दस्तक
पहुँचती नहीं,
दरअसल,
इन लेज़र किरणों से तरंगित -
राहों में कहीं, गुमशुदा सा
है आम आदमी।
अंतिम
मंज़िल छू चले हैं पीपल की - -
टहनियां, लेकिन हम
आज भी हैं अनजान
भू - तल की
माटी से।
पुरअसरार चेहरे लिए घूरते हैं
लोग एक दूजे को, ये और
बात है कि औपचारिकता
की मुस्कान होती है
उनकी ओंठों
पर। दरअसल, सारी दुनिया ही
अपने आप में है सिमटी हुई,
बहोत एकाकी, यूँ तो
कहने को ज़मीं से
आसमां तक है
छाया हुआ
आदमी।
* *
- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

Wednesday, 3 August 2016

कोई तुझसा नहीं - -

गुज़िश्ता रात की बारिश,
और आख़री पहर में
यूँ नींद का टूट
जाना,
कोई दस्तक गुमशुदा
अक्सर हमें सोने
नहीं देता।
हमारे
इतराफ़ है हर इक चीज़
यूँ तो ख़ूबसूरत और
दिलकश, फिर
भी न
जाने क्यूँ दिल है कि
किसी और का
होने नहीं
देता।
ये तुम्हारे चाहत का
जुनून है, या
परवाने
की आख़री उड़ान, हर
हाल में हमें यूँ धुंध
में खोने नहीं
देता।
अक्सर मैं लौट आता
हूँ यूँ ही ख़ाली हाथ
बाग़ ए अर्श से,
तेरा इश्क़
बेनज़ीर,
कोई और फूल, दिल
की धड़कनों में
पिरोने नहीं
देता। 

* *
- शांतनु सान्याल

Monday, 1 August 2016

हम और आप - -

हर शख़्स कहीं न कहीं होता
है ज़रा सा वादा ख़िलाफ़,
अपने अंदर से बाहर
निकल आना,
इतना भी
नहीं आसां, हर इक वजूद - -
रखता है अपना ही
पोशीदा लिहाफ़ !
न दोहराओ,
फिर वही
उम्र भर जीने मरने की बातें,
पल भर की मुलाक़ातों
से नहीं मुमकिन,
यूँ रूहों का
मिलाप।
ये नेह के नाज़ुक  बंधन हैं या
रस्म ए दुनिया की जंज़ीरें,
इक अनजाने
रस्साकसी
में जकड़े हुए से हैं हम और - -
आप।

* *
- शांतनु सान्याल