Tuesday, 28 March 2017

भूले - बिसरे चेहरे - -

उभरती हैं कुछ डूबती यादें, संग ए साहिल की तरह,
कुछ उजले - उजले से हैं, भूले - बिसरे चेहरे,
कुछ मद्धम - मद्धम , मीठे  दर्द ए दिल
की तरह। कहाँ मुमकिन है चाँदनी
को यूँ निगाहों में, उम्र भर के
लिए क़ैद करना, अँधेरा
ही बन जाए अक्सर
मेरा रहनुमा ए
सफ़र,
बहोत दूर, किसी मीनार ए क़न्दील की तरह। क़सम
सभी होते हैं टूट जाने के लिए, चाहे वो तेरी
पुरअसरार निगाहों की बात हो, या
आख़री पहर, ख़्वाबों का यूँ
आसानी से मुकर जाना,
कुछ न कुछ ज़ख्म
तो दे जाते हैं,
टूटे हुए
काँटे, हथेलियों में किसी ख़ूबसूरत क़ातिल की तरह। - -
उभरती हैं कुछ डूबती यादें, संग ए साहिल की
तरह - -

* *
- शांतनु सान्याल

 

Monday, 20 March 2017

उभरना और डूबना - -

सूखते आँखों के
किनारे,
टूटे
ख़्वाबों के हैं कतरन
बिखरे हुए दूर
तक फिर
चल
पड़े हम अनजान
मंज़िलों की
ओर, छोड़
आए
बहोत पीछे, वो अपने
- पराए सारे। तमाम
रेत के महल बह
 जाते  हैं
अपने
आप, आसां नहीं 
वक़्त के लहरों
को यूँ  रोक
पाना,
 उभरना या डूबना तो
हैं ज़िन्दगी के दो
पहलू, क़िस्मत
से चाहे, क्यूँ
न मिले
हमें ढेरों  चाँद सितारे।

* *
- शांतनु सान्याल

 
कुछ नमी सी है बाक़ी

Wednesday, 8 March 2017

आख़री बार - -

वो दर्द जो सदियों जा कर बन जाए रेत का
साहिल।  हर लम्हा टूटना, हर पल टूट
कर बिखरना, हर इक ख़ूबसूरत
कहानी में फिर ढलना और
मोम की तरह, आख़री
पहर, ख़ामोश
पिघलना,
जी चाहता है, कि मेरा वजूद भी हो, उन्ही - 
पागल लहरों में  कहीं शामिल। चलो
फिर करें अनाहूत हवाओं से
दोस्ती, अंधकार घिरने
से पहले, ज़रूरी है
दिल का
चिराग़ जलना, अंतर्मन का निखरना, फिर
चाँदनी में उन्मुक्त बिखरना, ज़िन्दगी चाहती है तुमसे आख़री बार, यूँ ही
अनंतकालीन  मिलना - -

* *
- शांतनु सान्याल