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Monday, 30 January 2017

उम्मीद से कहीं ज़ियादा - -

कुछ तेरी आँखों में रहे पिन्हां, कुछ मेरे
सीने में रहे ज़िंदा, वो लम्हात जिसे
धड़कते दिल ने अहसास किया।
कांपते लबों पे वो बिखरे
हुए बूंदें, शबनम थे
या ख़ामोश
तबादिल जज़्बात ! रहने दे पोशीदा यूँ
ही राज़ ए ज़िन्दगी, पल दो पल
ही सही लेकिन हमने उसे
भरपूर जिया। उस
मुख़्तसर रात
में हम ने
जी ली है उम्र से कहीं लंबी ज़िन्दगी !
तमाम ख़्वाहिश हो गए अब
ज़ाफ़रानी, तुम्हें पा कर
हम ने उम्मीद
से कहीं
ज़ियादा है पा लिया, मेरे  सीने में रहे
ज़िंदा, वो लम्हात जिसे धड़कते
दिल ने अहसास किया।

* *
- शांतनु सान्याल

Thursday, 12 January 2017

निबाह ज़रूरी है - -

आसपास यूँ तो आज
भी हैं ख़ुश्बू के
दायरे,
गुल काग़जी हों या
महकते हुए
यास्मीन,
निबाह ज़रूरी है
मुख़ौटे हों या
असल
चेहरे। बर ख़िलाफ़
क़ुदरत के यूँ
बहना नहीं
आसान,
रोके
से न रुके ये परिंदे
तो  मुहाजिर
ठहरे।
जिस्म के पिंजरे पर
अख़्तियार है
मुमकिन,
 दर ए
रूह,  ग़ैर  मुमकिन 
है लगाना
पहरे। 

* *
- शांतनु सान्याल

Sunday, 1 January 2017

नया जिल्द - -

नयेपन का एहसास, यक़ीनन उम्र बढ़ा
देता है, भूली - बिसरी किताब  पर
जैसे कोई जिल्द चढ़ा देता
है। वो कोई दस्तक
था या मेरा
भरम,
जो भी हो, इक पल के लिए ही सही वो
शख़्स, जीने की चाह बढ़ा देता है।
इस दौर में बहोत मुश्किल
है यूँ तो मौलिक चीज़ों
को हासिल करना !
फिर भी,
औपचारिकता ही क्यों न हो इन जाली
मुस्कुराहटों में, ऐ दोस्त, कुछ देर
के लिए ही सही ये जीवन में
प्राणवायु बढ़ा देता है।
भूली - बिसरी
किताब पर जैसे कोई जिल्द चढ़ा देता है।

**
- शांतनु सान्याल