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Wednesday, 10 May 2017

निमिष मात्र - -

बिन कुछ कहे, बिन कुछ बताए, साथ चलते
चलते, न जाने कब और कहाँ निःशब्द
मुड़ गए वो तमाम सहयात्री।
असल में बहुत मुश्किल
है जीवन भर का
साथ निभाना,
कुछ न
चाह कर भी बदल जाते हैं रास्ता अपना, कुछ
यूँ ही बंधे रहते हैं मजबूरियों की बेड़ियाँ
पांवों में डाल कर। न जाने वो कौन
थे जिन्होंने लिखी थी रूहानी
प्रणय कहानियाँ, जन्म - 
जन्मांतर के बंधनों
पर मख़मली
मुहर की
निशानियाँ। कोई भी साथ नहीं चलता उम्रभर,
वस्तुतः सब कुछ बंधा है, निमिष मात्र
की झिलमिलाहट पर। कौन किस
मोड़ पर अकेला छोड़ जाए,
कहना नहीं आसान।
यहाँ तक की
प्रतिबिम्ब
भी
बहुधा मांगता है मौजूद होने का एक मुश्त - -
प्रमाण।

* *
- शांतनु सान्याल