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Wednesday, 8 March 2017

आख़री बार - -

वो दर्द जो सदियों जा कर बन जाए रेत का
साहिल।  हर लम्हा टूटना, हर पल टूट
कर बिखरना, हर इक ख़ूबसूरत
कहानी में फिर ढलना और
मोम की तरह, आख़री
पहर, ख़ामोश
पिघलना,
जी चाहता है, कि मेरा वजूद भी हो, उन्ही - 
पागल लहरों में  कहीं शामिल। चलो
फिर करें अनाहूत हवाओं से
दोस्ती, अंधकार घिरने
से पहले, ज़रूरी है
दिल का
चिराग़ जलना, अंतर्मन का निखरना, फिर
चाँदनी में उन्मुक्त बिखरना, ज़िन्दगी चाहती है तुमसे आख़री बार, यूँ ही
अनंतकालीन  मिलना - -

* *
- शांतनु सान्याल