Tuesday, 18 July 2017

बज़्म -ए -ज़िन्दगी - -

 ख़्वाहिशों का यूँ भी कोई किनारा नहीं होता,

इक बेमौज नदी है, कोई बेसदा बहती हुई -
डूबनेवाले का यहाँ कोई भी सहारा नहीं होता।

जब आग लगी हो सारे शहर में बेलगाम - -
तब अपने - ग़ैर में कोई बँटवारा नहीं होता।

बहुत मुश्किल से बनते हैं, घरौंदे मेरे दोस्त -
अपनी मर्ज़ी से कोई यूँ ही बंजारा नहीं होता।

सिर्फ़ समझ का है उलटफेर, ऐ ईमानवालों !
हरगिज ख़ुदा, हमारा या तुम्हारा नहीं होता।

बज़्म -ए -ज़िन्दगी की है अपनी ही चाँद रात,
हर टूटनेवाला क़तरा नामी सितारा नहीं होता।

* *
- शांतनु सान्याल 

Friday, 2 June 2017

सजल अभिलाष - -

वो चीख जो ख़ामोश हो कर भी,
भेद जाएँ, क्षितिज की
दीवारें, न बाँट इस
ज़मीन को इस
दर्ज़ा, कि
हर
टुकड़े से निकले दुःखी माँ की - -
आवाज़, और बन जाए ये
ख़ूबसूरत दुनिया महज़
किसी वृद्धाश्रमीय
अभिशाप। न
जाने
कौन सा ईश है तुम्हारा, कभी - -
फ़ुरसत मिले तो हमें भी
उनसे मिलवाओ,
हमारा ख़ुदा,
पत्थर
का
हो कर भी ज़िन्दगी नहीं लेता। न
जाने किस स्वर्गलोक की है
उनकी कल्पना, हमारी
ख़्वाहिश है बहुत
सरल, किसी
नवजात
बच्चे
की एक निश्छल हंसी और रात ढले
फूलों पर गिरती हुई मद्धम -
मद्धम  कुछ सजल
बूंदें।

* *
- शांतनु सान्याल

Wednesday, 31 May 2017

अगला दरवाज़ा - -

 रात के आख़री पहर, सर्द हवाओं
के हमसफ़र, कभी तो गुज़रो
यूँ ही बेख़ुदी में इस
रहगुज़र।
वो तमाम कागज़ी नाव डूब गए
रफ़्ता - रफ़्ता, किनारों में
अब नहीं बसते
जुगनुओं के
शहर। वो
मांगते हैंअक्सर हम से वफ़ादारी
का सबूत, जो  लोग ओढ़े रहे,
फ़रेब का लबादा उम्र भर।
चेहरे और मुखौटे में
यहाँ तफ़ावत
नहीं आसां,
हाथ तो
मिलते
 हैं मगर, दिल होता है बेख़बर। चलो 
किसी बहाने ही  सही उसने 
याद किया, वरना अगला
दरवाज़ा भी यहाँ होता
है बेअसर। 

* *
- शांतनु सान्याल
 

Monday, 22 May 2017

रौशनी की बूंद - -

 कुछ कच्चे ख़्वाब टूट जाते हैं सुबह से
पहले, और कुछ तपते हैं उम्र भर,
फिर भी कहीं न कहीं सूरज
से शिकायत रह जाती
है दिल ही दिल
में, काश !
नरम
धूप में खिलता मुरझाया बचपन और - -
ख़्वाबों को मिलते धीरे धीरे एक
मुश्त तपन, लेकिन नियति
के आगे सब कुछ जैसे
होता है अर्थहीन,
कब कोंपल
बन जाए
एक
धूसर वृक्ष कहना नहीं सहज, देह में रहते
हैं केवल अस्थिपंजर, और सूरज के
दिए हज़ारों दग्ध निशान, फिर
भी जीवन सेमल की तरह
खिला रहता है सुबह
शाम, सीने में
समेटे
अनगिनत कांटों  के गुलिस्तान, सजाता
है वो हर हाल में लेकिन, नाज़ुक
ख़्वाबों के बियाबान।

* *
- शांतनु सान्याल

Wednesday, 10 May 2017

निमिष मात्र - -

बिन कुछ कहे, बिन कुछ बताए, साथ चलते
चलते, न जाने कब और कहाँ निःशब्द
मुड़ गए वो तमाम सहयात्री।
असल में बहुत मुश्किल
है जीवन भर का
साथ निभाना,
कुछ न
चाह कर भी बदल जाते हैं रास्ता अपना, कुछ
यूँ ही बंधे रहते हैं मजबूरियों की बेड़ियाँ
पांवों में डाल कर। न जाने वो कौन
थे जिन्होंने लिखी थी रूहानी
प्रणय कहानियाँ, जन्म - 
जन्मांतर के बंधनों
पर मख़मली
मुहर की
निशानियाँ। कोई भी साथ नहीं चलता उम्रभर,
वस्तुतः सब कुछ बंधा है, निमिष मात्र
की झिलमिलाहट पर। कौन किस
मोड़ पर अकेला छोड़ जाए,
कहना नहीं आसान।
यहाँ तक की
प्रतिबिम्ब
भी
बहुधा मांगता है मौजूद होने का एक मुश्त - -
प्रमाण।

* *
- शांतनु सान्याल






Monday, 8 May 2017

ये सोच कर अच्छा लगता है - -

बेवजह ही हम सोचते हैं कल सुबह
के वास्ते, जबकि पल में क्या
हो कहना है मुश्किल,
रोज़ सींचता हूँ
मैं गैलरी
के उस नन्हें से पौधे को, सोचता हूँ
कि कब उसमें फूल खिलेंगे,
और कब गन्धकोष से
सुगंध बिखरेंगे,
हालाँकि
हर चीज़ बंधा है अपनी जगह काल
चक्र से, फिर भी सपनों की
भूमि में सैर करना अच्छा
लगता है। मुझे मालूम
है किसी को भी
अपना बनाना
इतना भी
आसान नहीं, फिर भी रोज़ सुबह -
सवेरे, पक्षियों को बाजरी देना
अच्छा लगता है, उनका
यूँ निर्भय हो कर
पास आना
और
कौतूहल दृष्टि लिए देखना दिल को
सुकून देता है तपती  दुपहरी
में यूँ मैनों का चहचहाना,
अंतर्मन को कुछ
अलग तरह
से
पुलकित कर जाता है। माटी के - -
कटोरों में जल भरना अच्छा
लगता है, मालूम है
मुझको रस्मे
दुनिया
फिर भी नन्हें क़दमों को सहारा देना
अच्छा लगता है। पक्षी हों या
पौधे या मासूम बच्चों की
निर्मल हंसी, सब एक
दिन अपनी
तरह से
खिलेंगे, अपनी तरह से उड़ेगें, ये - -
सोच कर जीवन सार्थक
लगता है।

* *
- शांतनु सान्याल


Sunday, 7 May 2017

उन्मुक्त अभियान - -

रिश्तों के ग्राफ, सागरमुखी नदी,अहाते
की धूप, स्थिर कहाँ होते हैं, मौसम
के साथ बदल जाते हैं अपना
रास्ता, कुछ उकताहट,
कुछ मीठापन
रह जाता
है अपने साथ। यूँ तो बड़ी नज़ाकत से -
उसने, दिल के संदूक में तह किया
था मेरे हिस्से के रौशनी को,
लेकिन वक़्त ने आख़िर
छोड़ दी सिलवटों
के निशान।
जो भी
हो अच्छा लगता है नाज़ुक तितलियों का
यूँ हथेली पर आ उड़ जाना, मेघों
का ईशानकोण में उभरना,
अनाहूत नीम सर्द हवाओं
का शाम ढले
धीरे धीरे
बहना। दरअसल ज़िन्दगी को चाहिए कभी
कभी, इक मुश्त कबूतरों की उड़ान,
बहुत दूर, उन्मुक्त अभियान।

* *
- शांतनु सान्याल

Saturday, 6 May 2017

मेरे आसपास - -

जो कुछ टूटा फूटा बिखरा हुआ सा था
वो सभी तो मेरा अपना था, किसे
स्वीकार करें और किसे त्याग
करें, कहाँ मिलता है इस
दुनिया में मन वांछित
सुख। हमने भी
रफ़ू करके
जीना
सीख लिया। जो कुछ भी था अपने पास
बस उसी को भाग्य समझ लिया,
कुछ बेरंग दीवारों पर हमने
टांग दिए पुराने कैलेण्डर,
रंग विहीन फर्निचरों
पर चढ़ा दिए
चटक
रंगों के सस्ते आवरण, आईने की भी
शिकायत दूर की, गीले कपड़े से
उसे पोंछ दिया, लेकिन
बिम्ब को संवारना
नहीं था सहज,
अतएव
उसे सहर्ष स्वीकार किया, जैसा भी था
अपना जीवन, उसे हमने भरपूर
जिया। आए हो बरसों बाद
ज़रा बैठो, कुछ सुनो,
कुछ सुनाओ, न
देखो मेरे
आसपास, ये सभी आत्मीय स्वजन हैं -
मेरे, ज़रा से फटे पुराने ज़रूर हैं,
जब देह में ही दरारें निकल
आएं तब इन निर्जीव
वस्तुओं की क्या
बिसात।
समय अपना सूद हर हाल में वसूलता
है और छोड़ जाता है झुर्रियों के
निशान, जंग लगे परतों पर
लिख जाता है अतीत
के अहंकारी
गान।

* *
- शांतनु सान्याल



Friday, 5 May 2017

मौन आर्तनाद - -

तमाम लेनदेन रहते हैं निस्तब्ध से
जब उतरती है, सांझ दबे पाँव
पीपल तले, देह में लपेटे
रहस्यमयी अंधकार।
पुरातन मंदिर
के पट
जब होते हैं बंद, जीवन चक्र होता
है पुनः जागृत। सांध्य प्रदीप
के उठते धूम्र वलय
के साथ फिर
सजते हैं
राजपथ के मीनाबाज़ार। कुछ मृत
सीपों के खोल, कुछ वीरान
निगाहों के मरुस्थल,
कुछ दम तोड़तीं
समंदर की
लहरें
लिख जाती हैं गीले रेत पर जीवन
की कुछ अनकही कहानी,
कुछ अभिशप्त कथा
जो हैं यथावत
अपनी
जगह अडिग -अचल, कहने को - 
सारी पृथ्वी का रूप - रंग हो
चुका है बदल, लेकिन
नग्न सत्य है अपनी
जगह अविचल।
वही सजल
नेहों से
तकती, थकीहारी रात्रि करती है
पुनः विहान का अभिवादन,
स्व विलीन हो कर नव
सृजन की ओर
अग्रसर।

* *
- शांतनु सान्याल

Thursday, 4 May 2017

सभी को चाहिए - -

सभी को चाहिए कहीं न कहीं कुछ पल
सुकून भरा, कुछ महकते हुए दिन
कुछ खिलती हुईं रातें, कुछ
ख़ालिस अपनापन, कुछ
ख़ामोश निगाहों की
बातें। सभी को
चाहिए
कभी न कभी, कुछ नज़दीकियों की - -
गर्माहट, कुछ सर्दियों के ढलते
दिन, कुछ जाने पहचाने
दिल को छूते हुए
मधुरिम से
आहट,
सभी को चाहिए किसी न किसी मोड़ पर
मुन्तज़िर चेहरे, कुछ गुलाबी मुस्कान,
कुछ ख़ुश्बुओं  में डूबे हुए कलरव,
कुछ खुला खुला सा नीला
आसमान, तमाम
मुखौटों से
दूर
कोई इक सच्चा इंसान, सभी को चाहिए
कुछ पल के लिए ही सही सभी दुःख
दर्द से अवसान।

* *
- शांतनु सान्याल 

 

Sunday, 16 April 2017

ख़्वाहिश - -

दिल के दरीचे यूँ ही रहे हमेशा -
गुलज़ार, पतझर की हैं
अपनी अलग ही
मजबूरियां,
आते
जाते रहेंगे वो तो यूँ ही बारम्बार।
अँधेरे ओ उजाले  के दरमियां
इक लकीर होती है, ज़रा 
उम्मीदों से नीम
रौशन ! रहने
दे मुझे
भी उस नूर का तलबगार। न
जाने कौन था वो मजरूह
मुसाफ़िर, खूं -आलूद
क़दमों से गुज़रा
है कल रात,
तभी तो
है राहे बाग़ में यूँ शबनमी बहार।
फिर कोई ख़्वाब ए मरहम
लगा जा, इन सुलगते
आँखों के किनारे,
फिर जीस्त
मेरा
चाहे टूट कर बिखरना, तेरी बाँहों
में मानिंद आबशार। 

* *
- शांतनु सान्याल

Tuesday, 28 March 2017

भूले - बिसरे चेहरे - -

उभरती हैं कुछ डूबती यादें, संग ए साहिल की तरह,
कुछ उजले - उजले से हैं, भूले - बिसरे चेहरे,
कुछ मद्धम - मद्धम , मीठे  दर्द ए दिल
की तरह। कहाँ मुमकिन है चाँदनी
को यूँ निगाहों में, उम्र भर के
लिए क़ैद करना, अँधेरा
ही बन जाए अक्सर
मेरा रहनुमा ए
सफ़र,
बहोत दूर, किसी मीनार ए क़न्दील की तरह। क़सम
सभी होते हैं टूट जाने के लिए, चाहे वो तेरी
पुरअसरार निगाहों की बात हो, या
आख़री पहर, ख़्वाबों का यूँ
आसानी से मुकर जाना,
कुछ न कुछ ज़ख्म
तो दे जाते हैं,
टूटे हुए
काँटे, हथेलियों में किसी ख़ूबसूरत क़ातिल की तरह। - -
उभरती हैं कुछ डूबती यादें, संग ए साहिल की
तरह - -

* *
- शांतनु सान्याल

 

Monday, 20 March 2017

उभरना और डूबना - -

सूखते आँखों के
किनारे,
टूटे
ख़्वाबों के हैं कतरन
बिखरे हुए दूर
तक फिर
चल
पड़े हम अनजान
मंज़िलों की
ओर, छोड़
आए
बहोत पीछे, वो अपने
- पराए सारे। तमाम
रेत के महल बह
 जाते  हैं
अपने
आप, आसां नहीं 
वक़्त के लहरों
को यूँ  रोक
पाना,
 उभरना या डूबना तो
हैं ज़िन्दगी के दो
पहलू, क़िस्मत
से चाहे, क्यूँ
न मिले
हमें ढेरों  चाँद सितारे।

* *
- शांतनु सान्याल

 
कुछ नमी सी है बाक़ी

Wednesday, 8 March 2017

आख़री बार - -

वो दर्द जो सदियों जा कर बन जाए रेत का
साहिल।  हर लम्हा टूटना, हर पल टूट
कर बिखरना, हर इक ख़ूबसूरत
कहानी में फिर ढलना और
मोम की तरह, आख़री
पहर, ख़ामोश
पिघलना,
जी चाहता है, कि मेरा वजूद भी हो, उन्ही - 
पागल लहरों में  कहीं शामिल। चलो
फिर करें अनाहूत हवाओं से
दोस्ती, अंधकार घिरने
से पहले, ज़रूरी है
दिल का
चिराग़ जलना, अंतर्मन का निखरना, फिर
चाँदनी में उन्मुक्त बिखरना, ज़िन्दगी चाहती है तुमसे आख़री बार, यूँ ही
अनंतकालीन  मिलना - -

* *
- शांतनु सान्याल

  

Monday, 30 January 2017

उम्मीद से कहीं ज़ियादा - -

कुछ तेरी आँखों में रहे पिन्हां, कुछ मेरे
सीने में रहे ज़िंदा, वो लम्हात जिसे
धड़कते दिल ने अहसास किया।
कांपते लबों पे वो बिखरे
हुए बूंदें, शबनम थे
या ख़ामोश
तबादिल जज़्बात ! रहने दे पोशीदा यूँ
ही राज़ ए ज़िन्दगी, पल दो पल
ही सही लेकिन हमने उसे
भरपूर जिया। उस
मुख़्तसर रात
में हम ने
जी ली है उम्र से कहीं लंबी ज़िन्दगी !
तमाम ख़्वाहिश हो गए अब
ज़ाफ़रानी, तुम्हें पा कर
हम ने उम्मीद
से कहीं
ज़ियादा है पा लिया, मेरे  सीने में रहे
ज़िंदा, वो लम्हात जिसे धड़कते
दिल ने अहसास किया।

* *
- शांतनु सान्याल

Thursday, 12 January 2017

निबाह ज़रूरी है - -

आसपास यूँ तो आज
भी हैं ख़ुश्बू के
दायरे,
गुल काग़जी हों या
महकते हुए
यास्मीन,
निबाह ज़रूरी है
मुख़ौटे हों या
असल
चेहरे। बर ख़िलाफ़
क़ुदरत के यूँ
बहना नहीं
आसान,
रोके
से न रुके ये परिंदे
तो  मुहाजिर
ठहरे।
जिस्म के पिंजरे पर
अख़्तियार है
मुमकिन,
 दर ए
रूह,  ग़ैर  मुमकिन 
है लगाना
पहरे। 

* *
- शांतनु सान्याल

Sunday, 1 January 2017

नया जिल्द - -

नयेपन का एहसास, यक़ीनन उम्र बढ़ा
देता है, भूली - बिसरी किताब  पर
जैसे कोई जिल्द चढ़ा देता
है। वो कोई दस्तक
था या मेरा
भरम,
जो भी हो, इक पल के लिए ही सही वो
शख़्स, जीने की चाह बढ़ा देता है।
इस दौर में बहोत मुश्किल
है यूँ तो मौलिक चीज़ों
को हासिल करना !
फिर भी,
औपचारिकता ही क्यों न हो इन जाली
मुस्कुराहटों में, ऐ दोस्त, कुछ देर
के लिए ही सही ये जीवन में
प्राणवायु बढ़ा देता है।
भूली - बिसरी
किताब पर जैसे कोई जिल्द चढ़ा देता है।

**
- शांतनु सान्याल