Sunday, 16 April 2017

ख़्वाहिश - -

दिल के दरीचे यूँ ही रहे हमेशा -
गुलज़ार, पतझर की हैं
अपनी अलग ही
मजबूरियां,
आते
जाते रहेंगे वो तो यूँ ही बारम्बार।
अँधेरे ओ उजाले  के दरमियां
इक लकीर होती है, ज़रा 
उम्मीदों से नीम
रौशन ! रहने
दे मुझे
भी उस नूर का तलबगार। न
जाने कौन था वो मजरूह
मुसाफ़िर, खूं -आलूद
क़दमों से गुज़रा
है कल रात,
तभी तो
है राहे बाग़ में यूँ शबनमी बहार।
फिर कोई ख़्वाब ए मरहम
लगा जा, इन सुलगते
आँखों के किनारे,
फिर जीस्त
मेरा
चाहे टूट कर बिखरना, तेरी बाँहों
में मानिंद आबशार। 

* *
- शांतनु सान्याल

Tuesday, 28 March 2017

भूले - बिसरे चेहरे - -

उभरती हैं कुछ डूबती यादें, संग ए साहिल की तरह,
कुछ उजले - उजले से हैं, भूले - बिसरे चेहरे,
कुछ मद्धम - मद्धम , मीठे  दर्द ए दिल
की तरह। कहाँ मुमकिन है चाँदनी
को यूँ निगाहों में, उम्र भर के
लिए क़ैद करना, अँधेरा
ही बन जाए अक्सर
मेरा रहनुमा ए
सफ़र,
बहोत दूर, किसी मीनार ए क़न्दील की तरह। क़सम
सभी होते हैं टूट जाने के लिए, चाहे वो तेरी
पुरअसरार निगाहों की बात हो, या
आख़री पहर, ख़्वाबों का यूँ
आसानी से मुकर जाना,
कुछ न कुछ ज़ख्म
तो दे जाते हैं,
टूटे हुए
काँटे, हथेलियों में किसी ख़ूबसूरत क़ातिल की तरह। - -
उभरती हैं कुछ डूबती यादें, संग ए साहिल की
तरह - -

* *
- शांतनु सान्याल

 

Monday, 20 March 2017

उभरना और डूबना - -

सूखते आँखों के
किनारे,
टूटे
ख़्वाबों के हैं कतरन
बिखरे हुए दूर
तक फिर
चल
पड़े हम अनजान
मंज़िलों की
ओर, छोड़
आए
बहोत पीछे, वो अपने
- पराए सारे। तमाम
रेत के महल बह
 जाते  हैं
अपने
आप, आसां नहीं 
वक़्त के लहरों
को यूँ  रोक
पाना,
 उभरना या डूबना तो
हैं ज़िन्दगी के दो
पहलू, क़िस्मत
से चाहे, क्यूँ
न मिले
हमें ढेरों  चाँद सितारे।

* *
- शांतनु सान्याल

 
कुछ नमी सी है बाक़ी

Wednesday, 8 March 2017

आख़री बार - -

वो दर्द जो सदियों जा कर बन जाए रेत का
साहिल।  हर लम्हा टूटना, हर पल टूट
कर बिखरना, हर इक ख़ूबसूरत
कहानी में फिर ढलना और
मोम की तरह, आख़री
पहर, ख़ामोश
पिघलना,
जी चाहता है, कि मेरा वजूद भी हो, उन्ही - 
पागल लहरों में  कहीं शामिल। चलो
फिर करें अनाहूत हवाओं से
दोस्ती, अंधकार घिरने
से पहले, ज़रूरी है
दिल का
चिराग़ जलना, अंतर्मन का निखरना, फिर
चाँदनी में उन्मुक्त बिखरना, ज़िन्दगी चाहती है तुमसे आख़री बार, यूँ ही
अनंतकालीन  मिलना - -

* *
- शांतनु सान्याल

  

Monday, 30 January 2017

उम्मीद से कहीं ज़ियादा - -

कुछ तेरी आँखों में रहे पिन्हां, कुछ मेरे
सीने में रहे ज़िंदा, वो लम्हात जिसे
धड़कते दिल ने अहसास किया।
कांपते लबों पे वो बिखरे
हुए बूंदें, शबनम थे
या ख़ामोश
तबादिल जज़्बात ! रहने दे पोशीदा यूँ
ही राज़ ए ज़िन्दगी, पल दो पल
ही सही लेकिन हमने उसे
भरपूर जिया। उस
मुख़्तसर रात
में हम ने
जी ली है उम्र से कहीं लंबी ज़िन्दगी !
तमाम ख़्वाहिश हो गए अब
ज़ाफ़रानी, तुम्हें पा कर
हम ने उम्मीद
से कहीं
ज़ियादा है पा लिया, मेरे  सीने में रहे
ज़िंदा, वो लम्हात जिसे धड़कते
दिल ने अहसास किया।

* *
- शांतनु सान्याल

Thursday, 12 January 2017

निबाह ज़रूरी है - -

आसपास यूँ तो आज
भी हैं ख़ुश्बू के
दायरे,
गुल काग़जी हों या
महकते हुए
यास्मीन,
निबाह ज़रूरी है
मुख़ौटे हों या
असल
चेहरे। बर ख़िलाफ़
क़ुदरत के यूँ
बहना नहीं
आसान,
रोके
से न रुके ये परिंदे
तो  मुहाजिर
ठहरे।
जिस्म के पिंजरे पर
अख़्तियार है
मुमकिन,
 दर ए
रूह,  ग़ैर  मुमकिन 
है लगाना
पहरे। 

* *
- शांतनु सान्याल

Sunday, 1 January 2017

नया जिल्द - -

नयेपन का एहसास, यक़ीनन उम्र बढ़ा
देता है, भूली - बिसरी किताब  पर
जैसे कोई जिल्द चढ़ा देता
है। वो कोई दस्तक
था या मेरा
भरम,
जो भी हो, इक पल के लिए ही सही वो
शख़्स, जीने की चाह बढ़ा देता है।
इस दौर में बहोत मुश्किल
है यूँ तो मौलिक चीज़ों
को हासिल करना !
फिर भी,
औपचारिकता ही क्यों न हो इन जाली
मुस्कुराहटों में, ऐ दोस्त, कुछ देर
के लिए ही सही ये जीवन में
प्राणवायु बढ़ा देता है।
भूली - बिसरी
किताब पर जैसे कोई जिल्द चढ़ा देता है।

**
- शांतनु सान्याल