Monday, 7 November 2016

पिछले पहर की बरसात - -

न रोक अपने निगाहों के अक्स पलकों
के दायरे में, बिखरने दे रौशनी के
बूंद,  यूँ ही मद्धम - मद्धम,
बे - तरतीब, किसी 
ख़ूबसूरत
जज़्बात की तरह। उठ रहे हैं कोहरे के -
बादल, दूर पहाड़ों के बदन से, या
बोझिल सांसों में है रात ढलने
की थकन, एक  छुअन 
घेरे हुए है ज़िन्दगी
को गहराइयों
तक, किसी
पोशीदा तिलिस्मात की तरह। कोई -
बात तो ज़रूर है कि महकने से
लगे हैं बंजर ज़मीं के रास्ते,
तुमने शायद छुआ है
दिल की परतों को
आहिस्ता - -
पिछले
पहरवाली बरसात की तरह। बिखरने दे
रौशनी के बूंद,  यूँ ही मद्धम - मद्धम,
बे - तरतीब, किसी  ख़ूबसूरत
जज़्बात की तरह।

* *
- शांतनु सान्याल      







 

Friday, 4 November 2016

मुमकिन नहीं ज़र्द पत्तों का सदाबहार
होना, फिर भी दिल की तसल्ली के
लिए बुरा नहीं बे मौसम यूँ
बेक़रार होना। मुझे
मालूम है उम्र
का तक़ाज़ा,
फिर भी हर्ज़ भला क्या है ख़्वाबों का - -
तलबगार होना। मुरझाए चेहरों
का दर्द यहाँ कोई नहीं
समझता, बेहतर
है ख़ुद - ब -
ख़ुद ज़िन्दगी के आईने से दो चार होना।

* *
- शांतनु सान्याल


 


Tuesday, 1 November 2016

रंगीन कारवां - -

ऐ दोस्त, कुछ भी तैशुदा नहीं पहले से यहाँ,
इक वादी  ए  पुरअसरार है ये ज़िन्दगी,
और धुंध में डूबे हुए हैं नफ़्स के
कहकशां। न जाने क्या
क्या मन्सूबे थे उस
शख़्स के पास,
लेकिन
ढह गए सभी रफ़्ता रफ़्ता ख़्वाबों के मकां।
इतना भी ग़ुरूर ठीक नहीं कि आईना
भी पराया सा नज़र आने लगे,
मजाज ए क़िस्मत किसे
ख़बर, कब खिसक
जाए ये ज़मीं
और कब
दे जाए दग़ा ख़ामोश आसमां। ऐ दोस्त,
कुछ भी तैशुदा नहीं पहले से यहाँ,
है दूर - दूर तक वीरानी का
आलम, जहाँ कभी
रुकते थे दुनिया
के रंगीन
कारवां।

* *
- शांतनु सान्याल