Saturday, 30 July 2016

सिफ़र से ज़ियादा - -

इस मोड़ से आगे है सिर्फ़ अंतहीन ख़ामोशी,
और दूर तक बिखरे हुए सूखे पत्तों के
ढेर, फिर भी कहीं न कहीं तू
आज भी है शामिल इस
तन्हाइयों के सफ़र
में। इक बूंद
जो कभी
तेरी आँखों से टूट कर गिरा था मेरे सुलगते
सीने पर, यक़ीन जानो, उस पल से
आज तक आतिशफिशाँ से कुछ
कम नहीं मेरी ज़िन्दगी।
ये सही है कि  हर
इक ख्वाब का
इख़्तताम
है मुक़र्रर, फिर भी मेरी निगाहों को है सिर्फ़
तेरी दीदार ए आरज़ू। ये और बात है कि
पल भर में दुनिया ही बदल जाए,
होंठ तक पहुँचते ही कहीं
इज़हार ए जाम न
छलक जाए।
फिर भी
उम्मीद से ही है आबाद, चाँद सितारों की - -
दुनिया, वरना ये आसमान इक
सिफ़र से ज़ियादा कुछ भी
नहीं।

* *
- शांतनु सान्याल

 

Saturday, 23 July 2016

कभी हो सके तो आओ -

ज़िन्दगी की ज्यामिति
इतनी भी मुश्किल
नहीं कि जिसे
ढूंढे हम,
हाथ
की लकीरों में। तुम्हारे
शहर में यूँ तो हर
चीज़ है ग़ैर
मामूली,
मगर
अपना दिल लगता है
सिर्फ फ़क़ीरों में।
कभी हो सके
तो आओ
यूँ ही
नंगे पांव चलके मेरी
दुनिया है बसी,
बिन पाँव के
शहतीरों
में।

* *
- शांतनु सान्याल

Saturday, 16 July 2016

क़दम दर क़दम - -

अंततः सुबह के साथ ही वन्य नदी का
उफान भी उतर गया, सपनों की
थी रहगुज़र या दीवानापन
मेरा, छू कर अंतरतम,
वो जलतरंग सा
अहसास, न
जाने किधर गया। उनकी नज़दीकियां
यूँ तो चाँद रातों से कम न थीं,  बूँद
बूँद आँखों से नूर, यूँ रूह की
गहराइयों में उतरती
रही, ज़िन्दगी
हर पल
किसी की चाहत में यूँ डूबती उभरती - -
रही। कोई ख़ुश्बू पुरनम या कोई
छुअन शबनमी, न जाने
क्या था उसका राज़
ए तब्बसुम !
दूर तक
जैसे महके चन्दन वन और खिलते रहे
गुलाब क़दम दर क़दम।

* *
- शांतनु सान्याल

Friday, 8 July 2016

अपना ख़ुदा - -

आँखों का खारापन रहा अपनी जगह
मुसलसल, कहने को यूँ थी बारिश
रात भर। न जाने कौन था वो
हमदर्द, छू कर रूह मेरी
ओझल हुआ यूँ
अकस्मात,
जैसे उड़
जाए अचानक नूर की बूंद एक साथ।
कभी उसने बनाया मेरा वजूद
इक माटी का खिलौना,
और कभी मैंने ख़ुद
ही तलाशा इक
कांच का
बिछौना। किस आख़री पहर में वो रहे
मेरी सांसों में शामिल, कहना है
बहोत मुश्किल, आसां नहीं
लहरों से लहरों को यूँ
जुदा करना, इतनी
मुहोब्बत
ठीक नहीं, कि ज़हर भी लगे अमृत - -
कहीं लग न जाए संगीन जुर्म
तुम पे, यूँ सरे महफ़िल 
बेनक़ाब हो, किसी
को अपना ख़ुदा
कहना।

* *
- शांतनु सान्याल
 

Monday, 4 July 2016

जो उड़ गए तो उड़ गए - -

कुछ रास्ते कभी भुलाए नहीं जाते, चाहे
जितने भी सुख क्यों न हों आज के
सफ़र में, कुछ दर्द किसी के
वास्ते भुलाए नहीं जाते।
हमें ज़रा भी ख़बर
न थी कि
छीन
लेंगे वो हमसे हमारा वजूद, चलो ठीक
ही है जिस्म का तलबगार होना,
रूह आलूद ख़ुश्बू मगर
मिटाने से भी
मिटाए
नहीं जाते। वही दालान है फूलों की - -
क्यारियों वाला, वही अहाते में
झूलता हुआ  ख़ाली पिंजरा,
वो लम्हा था या कोई
सुनहरा परिंदा,
किसे
मालूम ? जो उड़ गया मौसमी हवाओं
के हमराह, लाख चाहें मगर कुछ
ख़्वाहिश लौटाए नहीं जाते।
कुछ दर्द किसी के वास्ते
भुलाए नहीं
जाते। 

* *
- शांतनु सान्याल