Wednesday, 3 August 2016

कोई तुझसा नहीं - -

गुज़िश्ता रात की बारिश,
और आख़री पहर में
यूँ नींद का टूट
जाना,
कोई दस्तक गुमशुदा
अक्सर हमें सोने
नहीं देता।
हमारे
इतराफ़ है हर इक चीज़
यूँ तो ख़ूबसूरत और
दिलकश, फिर
भी न
जाने क्यूँ दिल है कि
किसी और का
होने नहीं
देता।
ये तुम्हारे चाहत का
जुनून है, या
परवाने
की आख़री उड़ान, हर
हाल में हमें यूँ धुंध
में खोने नहीं
देता।
अक्सर मैं लौट आता
हूँ यूँ ही ख़ाली हाथ
बाग़ ए अर्श से,
तेरा इश्क़
बेनज़ीर,
कोई और फूल, दिल
की धड़कनों में
पिरोने नहीं
देता। 

* *
- शांतनु सान्याल