Wednesday, 27 April 2016

अवकाश - -

वो तमाम ख़ूबसूरत पल, रहने दो यूँही
जज़्ब मुक्कमल, अभी बहुत दूर
हैं सावन के मेघ सजल।
ठहरो कुछ देर और
ज़रा कि तपते
जज़्बात
को संदली अहसास मिले, भटका हूँ मैं
अनवरत, न जाने कहाँ - कहाँ उम्र
भर, अब जाके तुम मिले हो
किसी ग़ुमशुदा मंज़िल
की तरह, चलो
फिर उड़ें
तितलियों के हमराह, और पहुँचे किसी
वर्षा वन में, सुलगते जीवन को
इसी बहाने कुछ पलों का
अवकाश मिले।

* *
- शांतनु सान्याल