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Monday, 29 February 2016

मायावी रात - -

हर कोई यहाँ है एक ही मंज़िल का मुसाफ़िर,
ये दिगर बात है कि फ़रेब सोच बना दे
तुम्हें मोमिन और मुझे काफ़िर !
तमाम तफ़ावत घुलमिल
से जाएंगे ग़र दिल
की गहराई
बने
शीशे की तरह पारदर्शी, ज़िन्दगी भर वो यूँ -
ही दौड़ता रहा अविराम, मृगतृष्णा के
पीछे, फिर भी न जाने क्यूँ
अंतरतम उसका हो न
सका अनुरूप
आरशी !
इक मौन अट्टहास और इक निःशब्द गूँज, वो
शख़्स आख़िर लौट आया हमेशा की
तरह ख़ाली हाथ, फिर वही दूर
तक अंतहीन ख़ामोशी,
फिर वही ख़्वाबों
के इंद्रजाल,
फिर वही उसे छूने की अभिलाष, फिर वही - -
मायावी रात !

* *
- शांतनु सान्याल 
 

Tuesday, 23 February 2016

इंतज़ार - -

मिज़ाज ए मौसम, परदेशी परिंदे,
और चेहरे में उभरती अदृश्य
लकीरें, यक़ीन मानो
बहोत कठिन
है वक़्त
को गिरफ़्तार करना। सुलगते दिन,
सिमटती नदी, उड़ते हुए ज़र्द
पत्ते और उनकी झुकी
निगाहों के साए,
इस हाल
में, कौन न चाहेगा ज़िन्दगी का यूँ
इंतज़ार करना।

* *
- शांतनु सान्याल

Monday, 22 February 2016

 ख़ुद से मुलाक़ात हुई - -

कितने दिनों के बाद यूँ आईने से बात हुई
कितने दिनों के बाद ख़ुद से मुलाक़ात हुई,

उम्र तो बीत गई यूँ दरख़्तों की देखभाल में
आख़री ढलान पे जा कहीं परछाई साथ हुई,

किसे याद रहता है बचपन की नादानियां,
ख़्वाबों के सफ़र में यूँ तमाम मेरी रात हुई,

हर कोई था बेबश हर कोई जां छुड़ाता सा,
रात ढलते ज़िन्दगी, तवायफ़ी जज़्बात हुई,

तुम भी चाहो तो आख़री ठहाका लगा जाओ,
बहुत दिनों बाद शहर में आज बरसात हुई,

* *
- शांतनु सान्याल