Sunday, 20 December 2015

अब फ़र्क़ नहीं पड़ता - -

हमने ख़ुद ही क़बूला है जुर्म अपना
अब फ़र्क़ नहीं पड़ता, सज़ा ए
मौत पे मुहर किस किस
की है। ये दस्तबंद,
ये ज़ंजीर ए
आहन,*
बदल नहीं सकते मेरी वाबस्तगी ए
रूह उनसे, अब फ़र्क़ नहीं पड़ता
ख़ारिज़ ए जन्नत पे असर
किस किस की है।
हमने तो सब
कुछ पा
लिए उन्हें तहे दिल उतारने के बाद,
अब कोई ख़्वाहिश नहीं बाक़ी
इश्क़ उनका पाने के बाद,
अब ये धूसर ज़मीं ही
लगती है हमें
दिलो जां
से ख़ूबसूरत कहीं, अब फ़र्क़ कुछ भी
नहीं पड़ता, हमें बर्बाद करने में
ये पोशीदा ज़हर किस
किस की है। सज़ा
ए मौत पे मुहर
किस किस
की है।

* *
- शांतनु सान्याल
* लोहा
  

Thursday, 17 December 2015

सुबह का इंतज़ार - -

तयशुदा है जब रात का
गुज़रना, फिर सुबह
का इंतज़ार कौन
करे। हम यूँ
भी मुकम्मल हो चुके
तुम्हारे अब क़िश्तों
में भला प्यार
कौन करे।
हाकिम ओ मुहाफ़िज़
सभी हैं हैरां, रूह
गुमशुदगी का
ऐतबार
कौन करे। किसी ने -
भी न देखा दो
बदन का
एक जान होना, वो -
हमआहंगी का
आलम, वो
रूहों का
एक होना, जो गुज़र
गए, वो लम्हात
अब भी हैं
सांसों में कहीं गुम, -
इक अहसास
ए ज़िन्दगी
थी उसकी
नज़दीकी, इस से -
ज़ियादा किसी
और चीज़
का तलबगार कौन करे।
* *
- शांतनु सान्याल
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Monday, 14 December 2015

इस छोर से उस अंत तक - -

सूरज की है अपनी ही -
मजबूरी, शाम से
पहले उसका
डूबना है
ज़रूरी। जीवन की नाव,
और अंतहीन बहाव,
फिर भी घाट
तक
पहुंचना है ज़रूरी। जले
हैं मंदिर द्वार के
दीप, गहन
अंधकार
है बहुत समीप, फिर भी,
किसी तरह से अंतर्मन
को छूना है
ज़रूरी।
मल्लाह और किनारे के
दरमियान, शायद था
कोई अदृश्य
आसमान,
इस
छोर से उस अंत तक,
हर हाल में जीवन
का बहना है
ज़रूरी।

* *
- शांतनु सान्याल

Thursday, 10 December 2015

अपनी धरती - -

कितने सल्तनत बने और
बिखरे इसी ज़मीं की
गोद में, लेकिन
इसका
आँचल कभी सिमटा नहीं।
ये माँ है अंतहीन
दुआओंवाली,
इसे
जिसने भी ठुकराया, चैन
से सो न पाया उम्र भर
कभी। चाहे तुम
जहाँ भी
जाओ,
सहरा से किसी गोशा ए
फ़िरदौस में, लौट
आओगे इक
दिन,
इसी माँ के दामन ए
चाक में। ये ज़मीं
है फ़रिश्तोंवाला,
यहाँ हर चीज़
है इबादत
के क़ाबिल, यहाँ ज़िन्दगी
उभरती है संग ओ
राख में।

* *
- शांतनु सान्याल 

Sunday, 6 December 2015

सम्पूर्ण जन गण मन - - राष्ट्रीय गीत
.
गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर भारत के बँगला साहित्य के शिरोमणि कवि थे.
उनकी कविता में प्रकृति के सौंदर्य और कोमलतम मानवीय भावनाओं का उत्कृष्ट चित्रण है.
"जन गण मन" उनकी रचित एक विशिष्ट कविता है जिसके प्रथम छंद को हमारे राष्ट्रीय गीत होने का गौरव प्राप्त है.
बंगला मूल शब्दार्थ *

जन गण मन - -
जन गण मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
पंजाब सिन्ध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल बंग
विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे
तव शुभ आशिष मागे
गाहे तव जय गाथा
जन गण मंगल दायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे जय हे जय हे
जय जय जय जय हे

अहरह तव आह्वान प्रचारित
शुनि तव उदार वाणी
हिन्दु बौद्ध शिख जैन
पारसिक मुसलमान खृष्टानी
पूरब पश्चिम आशे
तव सिंहासन पाशे
प्रेमहार हय गाँथा
जन गण ऐक्य विधायक जय हे
भारत भाग्य विधाता
जय हे जय हे जय हे
जय जय जय जय हे

*(अहरह: निरन्तर; तव: तुम्हारा
शुनि: सुनकर
आशे: आते हैं
पाशे: पास में
हय गाँथा: गुँथता है
ऐक्य: एकता )
पतन-अभ्युदय-बन्धुर-पंथा
युगयुग धावित यात्री,
हे चिर-सारथी,
तव रथचक्रे मुखरित पथ दिन-रात्रि
दारुण विप्लव-माझे
तव शंखध्वनि बाजे,
संकट-दुख-त्राता,
जन-गण-पथ-परिचायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

*(अभ्युदय: उत्थान; बन्धुर: मित्र का
धावित: दौड़ते हैं
माझे: बीच में
त्राता: जो मुक्ति दिलाए
परिचायक: जो परिचय कराता है )
घोर-तिमिर-घन-निविड़-निशीथे
पीड़ित मुर्च्छित-देशे
जाग्रत छिल तव अविचल मंगल
नत-नयने अनिमेष
दुःस्वप्ने आतंके
रक्षा करिले अंके
स्नेहमयी तुमि माता,
जन-गण-दुखत्रायक जय हे
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे

*(निविड़: गाढ़ा
छिल: था
अनिमेष: अपलक
करिले: किया; अंके: गोद में )

रात्रि प्रभातिल उदिल रविछवि
पूर्व-उदय-गिरि-भाले,
गाहे विहन्गम, पुण्य समीरण
नव-जीवन-रस ढाले,
तव करुणारुण-रागे
निद्रित भारत जागे
तव चरणे नत माथा,
जय जय जय हे, जय राजेश्वर,
भारत-भाग्य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे
- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
* (प्रभातिल: प्रभात में बदला; उदिल: उदय हुआ )




Saturday, 5 December 2015

अद्भुत हिलोर - -

आधी रात, जब निस्तब्ध धरा
करे तारों से बात, सुनसान
सड़कों में घूमे कोई
ख़्वाबों का
फेरीवाला। आकाशगंगा तब
गलबहियां डाले ले जाना
चाहे मुझे, बहुत दूर,
जहाँ रहता है
इक
सतरंगी फिरकीवाला। उस -
इंद्रधनुषी हिंडोले में
जीवन पाए
नव
अनुभूति, तन - मन में उठे
तब इक अद्भुत हिलोर
करे इंद्रजाल सा
कोई नयन -
मदिरावाला ।
* *
- शांतनु सान्याल



Thursday, 3 December 2015

रुका सा सवेरा - -

फिर बह चली हैं, नम
संदली हवाएँ फिर
कहीं उसने
ज़ुल्फ़ है
बिखेरा।
फिर निगाहों में उभरे
हैं अक्स उनके
फिर कहीं
दिल में
चाँदनी का है डेरा। उड़
चले है दूर नाज़ुक
परों की तितलियाँ,
खोजती है मेरी
नज़र फिर
ख़्वाबों का बसेरा। रहने
दे मुझे यूँ ही उनींद
पलों में मुल्लबस, *
क्षितीज के
पार कहीं अभी है रुका 
सवेरा।

* *
- शांतनु सान्याल 

* खोया हुआ




Tuesday, 1 December 2015

हज़ार बार - -

न कर दिल के दरवाज़े
 बंद, यूँ बेरुख़ी से
दोस्त, बहोत
मुश्किल
से कभी दस्तक ए बहार
होते हैं। यूँ तो सरसरी
निगाहों की कमी
नहीं जहां में,
लेकिन
बहोत कम तीर ए नज़र
दिल के पार होते हैं।
उनसे मिल कर
अक्सर
तिश्नगी बढ़ जाती है
बारहा, जो ख़ामोश
रह कर भी
गहरे,
इश्क़ ए तलबगार होते
हैं। यूँ तो, वो नहीं
मुख़ातिब
मुझसे,
फिर भी, न जाने क्यूँ वो
मेरे पहलू में इक नहीं,
हज़ार बार
होते हैं।

* *
- शांतनु सान्याल